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सुप्रीम कोर्ट दलित ईसाइयों पर अपने फैसले पर करे पुनर्विचार: भाकपा

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रामनरसिम्हा राव

नगरी (चित्तूर): भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के सेंट्रल कंट्रोल कमिशन के अध्यक्ष डॉ. के. नारायणा ने हालिया सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है। चित्तूर जिले के नगरी शहर में ईसाई पादरियों, समुदाय के नेताओं और विश्वासियों के साथ इस मुद्दे पर विचार-विमर्श करने के बाद मंगलवार को उन्होंने मीडिया को संबोधित किया। डॉ. नारायणा ने आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के उस फैसले को बरकरार रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट की कड़ी निंदा की, जिसमें कहा गया था कि दलित ईसाई अनुसूचित जाति के दर्जे के लाभों के हकदार नहीं हैं।

ईसाई पादरी पर हमले और कानूनी सुरक्षा का मुद्दा

डॉ. नारायणा ने बताया कि उच्च न्यायालय ने एक ईसाई पादरी पर हुए हमले के मामले में कहा था कि दलित ईसाई एससी/एसटी (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत सुरक्षा की मांग नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस फैसले पर मुहर लगाने की आलोचना करते हुए उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत में धर्म परिवर्तन करने से किसी व्यक्ति की जातीय पहचान या छुआछूत और भेदभाव की जमीनी वास्तविकता खत्म नहीं हो जाती। उन्होंने कहा कि शीर्ष अदालत को इस बुनियादी सामाजिक वास्तविकता को स्वीकार करना चाहिए और उन्हें न्यूनतम कानूनी सुरक्षा हर हाल में सुनिश्चित करनी चाहिए।

भाकपा नेता ने आरोप लगाया कि यह फैसला भाजपा, आरएसएस और संघ परिवार के वैचारिक एजेंडे को दर्शाता है, जिसकी गूंज अब न्यायिक निर्णयों के माध्यम से सुनाई दे रही है। उन्होंने इसे बेहद दुर्भाग्यपूर्ण करार दिया। बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले के फैसले जैसे पिछले उदाहरणों का हवाला देते हुए डॉ. नारायणा ने गंभीर दावा किया कि ऐसे फैसले सुनाने वाले न्यायाधीशों को बाद में राज्यपाल, लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष और राज्यसभा की सदस्यता जैसे पदों से पुरस्कृत किया गया था। उन्होंने आगे आरोप लगाया कि इस वर्तमान मामले में भी, ऐसे फैसले सुनाने वाले न्यायाधीश भाजपा द्वारा भविष्य में दिए जाने वाले पदों के प्रलोभन से प्रभावित हो सकते हैं।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 से 28 (जो धार्मिक स्वतंत्रता की गारंटी देते हैं) का हवाला देते हुए, डॉ. नारायणा ने तर्क दिया कि केवल धर्म परिवर्तन के आधार पर अधिकारों से वंचित करना पूरी तरह से संवैधानिक सिद्धांतों के खिलाफ है। उन्होंने ऐसे फैसलों को सही ठहराने के लिए 1950 के राष्ट्रपति के आदेश का सहारा लेने की कड़ी आलोचना की और इसे दलितों के साथ घोर अन्याय बताया। इसके साथ ही, उन्होंने भाजपा, आरएसएस और विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों पर एक बहुत बड़ी साजिश का हिस्सा होने का सीधा आरोप लगाया।

प्रेस वार्ता के दौरान डॉ. के. नारायणा ने स्पष्ट मांग की कि सुप्रीम कोर्ट दलित ईसाइयों के संबंध में दिए गए अपने फैसले पर तुरंत पुनर्विचार करे। उन्होंने केंद्र सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि भाजपा सरकार को सबक सिखाने के लिए आने वाले समय में देश भर में व्यापक विरोध प्रदर्शन आयोजित किए जाएंगे।

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