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न्यूनतम वेतन और एमएसपी पर आर-पार की लड़ाई: सीटीयू और एसकेएम ने सरकार को घेरा, 1 मई को देशव्यापी प्रदर्शन का आह्वान

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सीटीयू और एसकेएम ने जारी किया संयुक्त बयान

नई दिल्ली, 28 अप्रैल 2026: केंद्रीय ट्रेड यूनियनों (सीटीयू) के मंच और संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) ने मंगलवार को एक विस्तृत संयुक्त बयान जारी कर देश भर में श्रमिकों पर हो रहे दमन की कड़ी निंदा की है। दोनों संगठनों ने स्पष्ट किया है कि वे मजदूरों और किसानों के अधिकारों के लिए अपना संघर्ष तेज करेंगे और भविष्य की कार्ययोजना तय करने के लिए 13 मई को नई दिल्ली में एक बड़ी संयुक्त बैठक आयोजित की जाएगी।

बयान में उठाई गई प्रमुख मांगें और बिंदु:

  • लंबे समय से लंबित वेतन वृद्धि, आठ घंटे के कार्य दिवस, ओवरटाइम भत्ते के कानूनी अधिकार और साप्ताहिक अवकाश की मांग कर रहे आंदोलनकारी श्रमिकों पर हुए पुलिसिया दमन की कड़ी निंदा।

  • गिरफ्तार किए गए सभी श्रमिकों की बिना शर्त रिहाई, मुकदमों की वापसी और किसी भी प्रकार की अवैध नजरबंदी (हाउस अरेस्ट) पर तत्काल रोक लगाने की मांग। साथ ही, प्रवासी श्रमिकों के लिए बुनियादी सुविधाओं और एलपीजी की व्यवस्था करने की अपील।

  • साल 2015 से लंबित भारतीय श्रम सम्मेलन (आईएलसी) को तत्काल बुलाने की मांग।

  • किसानों की उपज के लिए गारंटीकृत खरीद के साथ एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) की कानूनी गारंटी और फसल नुकसान के लिए मुआवजे की मांग। संगठनों ने अमेरिका के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते को राष्ट्रीय हितों के लिए हानिकारक बताते हुए उसे सिरे से खारिज कर दिया है।

  • एसकेएम ने देश भर के किसानों से 1 मई (मई दिवस) के जुलूसों में भारी संख्या में शामिल होने की अपील की है।

दस वर्षों से नहीं बढ़ा न्यूनतम वेतन, प्रवासी मजदूर बेहाल

रिपोर्ट के अनुसार, 24 अप्रैल को आयोजित सीटीयू और एसकेएम की संयुक्त बैठक में इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की गई कि आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में भारी उछाल के बावजूद पिछले 10 वर्षों से कई राज्यों में न्यूनतम वेतन में कोई संशोधन नहीं किया गया है। अधिकांश औद्योगिक क्षेत्रों में काम करने वाले अनुबंध, दिहाड़ी या निश्चित अवधि (फिक्स्ड-टर्म) के कर्मचारी मुख्य रूप से प्रवासी हैं, जो बुनियादी सुविधाओं के बिना अनिश्चित परिस्थितियों में जीवन यापन कर रहे हैं। बयान में आरोप लगाया गया है कि इन श्रमिकों को यूनियन बनाने का अधिकार नहीं है और ऐसा प्रयास करने पर उन्हें प्रताड़ित किया जाता है।

देश भर में भड़के स्वतःस्फूर्त आंदोलन

संगठनों ने संज्ञान लिया है कि हालिया श्रमिक आंदोलन कोई अलग-थलग घटनाएं नहीं हैं। बयान में बताया गया है कि ठीक दो महीने पहले बिहार के बरौनी रिफाइनरी क्षेत्र में हजारों ठेका कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर आंदोलन किया था। नौकरी खोने के डर के बावजूद वे आठ घंटे का कार्य दिवस, दोगुना ओवरटाइम, वेतन वृद्धि, कार्यस्थल पर सुरक्षा, नियमित कर्मचारियों के बराबर छुट्टियां और वेतन पर्ची जैसी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे थे।

इसके बाद पानीपत और सूरत में भी हजारों श्रमिकों ने इन्हीं मांगों और वेतन गणना के लिए शहर के ग्रेड में वृद्धि को लेकर बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए। इनमें अधिकांश कर्मचारी प्रवासी थे। वहीं, हरियाणा के मानेसर में दस साल बाद गठित राज्य न्यूनतम वेतन बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने की मांग को लेकर मजदूर कारखानों से बाहर आ गए। श्रम विभाग के साथ वार्ता के बावजूद, पुलिस ने लाठीचार्ज किया और सैकड़ों लोगों को गिरफ्तार कर लिया। भारी दबाव के बाद हरियाणा सरकार ने अधिसूचना जारी करने की बात तो मानी, लेकिन यह राशि बोर्ड की सिफारिश से कम थी।

यूपी में दमन: 'शहरी नक्सल' और 'पाकिस्तानी साजिश' का झूठा नैरेटिव

नोएडा की कई फैक्ट्रियों में भी न्यूनतम वेतन में वृद्धि, 8 घंटे के काम और सामाजिक सुरक्षा की मांग को लेकर मजदूरों ने मोर्चा खोला। यूनियनों ने ध्यान दिलाया कि 2012 से उत्तर प्रदेश में न्यूनतम वेतन में कोई संशोधन नहीं हुआ है। इन जायज मांगों को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों को पुलिस बल द्वारा क्रूरता से कुचला गया। सैकड़ों मजदूरों को पीटा गया, गिरफ्तार किया गया और उन पर गंभीर आरोप लगाकर जमानत देने से इनकार कर दिया गया।

सीटीयू और एसकेएम ने आरोप लगाया है कि केंद्र और यूपी सरकार अपनी विफलताओं को छिपाने और यूपी के चहुंमुखी विकास के झूठे प्रचार को बचाने के लिए इस मजदूर आंदोलन को 'शहरी नक्सलियों' और 'पाकिस्तानी साजिश' का नाम दे रही है। संगठनों ने इसकी तुलना किसान आंदोलन को 'खालिस्तानी' बताकर बदनाम करने की कोशिशों से की। उन्होंने राष्ट्र-विरोधी ताकतों की संलिप्तता के इस आख्यान को पूरी तरह खारिज करते हुए सरकारों से अपनी जिम्मेदारी लेने की मांग की है।

श्रम संहिताओं से बढ़ेगी औद्योगिक अशांति

बयान में बताया गया है कि भिवाड़ी और नीमराना में भी समान मांगों को लेकर हुए प्रदर्शनों में श्रमिकों पर पुलिस के साथ-साथ गुंडों द्वारा हमले किए गए। यूनियनों ने चेतावनी दी है कि यदि यूनियनों को खत्म करने के लिए नई श्रम संहिताओं (लेबर कोड) को लागू किया जाता है, तो इसके कारण पैदा होने वाली औद्योगिक अशांति के लिए पूरी तरह सरकार जिम्मेदार होगी।

पश्चिम एशिया के घटनाक्रमों के कारण ईंधन की बढ़ती कीमतों, गैस की कालाबाजारी और बेलगाम महंगाई के बीच कम वेतन पर गुजारा न कर पाने के कारण श्रमिक अब वापस अपने गृहनगर की ओर पलायन करने को मजबूर हैं।

'हाउस अरेस्ट' को बताया अवैध

संयुक्त बयान में यूपी की 'डबल इंजन' सरकार पर निशाना साधते हुए कहा गया है कि वह न्याय के लिए लड़ रहे कार्यकर्ताओं को उकसाने का मास्टरमाइंड करार देती है। नोएडा पुलिस द्वारा ट्रेड यूनियन नेताओं को "नज़रबंद (हाउस अरेस्ट)" किए जाने को पूरी तरह अवैध बताया गया है, क्योंकि भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) में इसका कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है। संगठनों ने सभी राजनीतिक दलों से इस अलोकतांत्रिक कदम का विरोध करने की अपील की है।

4 लेबर कोड रद्द हों, आईएलसी की बैठक बुलाई जाए

यूनियनों का आरोप है कि कार्यस्थलों पर श्रम कानूनों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है, निरीक्षण बंद हैं और सुरक्षा से समझौता किया जा रहा है, जिससे मजदूरों की जान जा रही है। इन समस्याओं को सुलझाने के बजाय केंद्र सरकार ने 44 केंद्रीय श्रम कानूनों को खत्म कर चार कठोर श्रम संहिताएं लागू कर दी हैं, जो कार्यबल को गुलामी की ओर धकेलने, काम के घंटे बढ़ाने, हड़ताल का अधिकार छीनने और नियोक्ताओं को छूट देने के लिए लाई गई हैं। सीटीयू ने इन संहिताओं को रद्द करने और 2015 से लंबित भारतीय श्रम सम्मेलन (आईएलसी) को तुरंत बुलाने की मांग दोहराई है।

किसानों के साथ विश्वासघात और व्यापार समझौतों का खतरा

एसकेएम ने बयान में कहा है कि तीन कृषि कानूनों की वापसी के समय किसानों से किए गए वादों के साथ विश्वासघात हुआ है। सरकार ने एमएसपी (@C2+50%) और ऋण माफी देने से इनकार कर दिया है। इसके विपरीत, सरकार राष्ट्रीय कृषि विपणन नीति ढांचा और बीज विधेयक 2025 के माध्यम से पुराने कृषि कानूनों को पिछले दरवाजे से वापस लाने की कोशिश कर रही है। अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौते कृषि और एमएसएमई क्षेत्रों के लिए घातक बताए गए हैं, जिससे ग्रामीण भारत में अशांति बढ़ रही है।

आगे की रणनीति: 1 मई को प्रदर्शन, 13 मई को अहम बैठक

इन सभी ज्वलंत मुद्दों पर विचार करने और आर-पार की लड़ाई की रूपरेखा तय करने के लिए 13 मई को नई दिल्ली में सीटीयू, स्वतंत्र फेडरेशनों और एसकेएम की एक विस्तृत बैठक होगी।

अंत में, सीटीयू और एसकेएम ने पूरे भारत के किसानों और मजदूरों से अपील की है कि वे 1 मई को अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक दिवस के अवसर पर आयोजित जुलूसों में भाग लें और कॉर्पोरेट-समर्थक नीतियों के खिलाफ मजदूर-किसान एकता का प्रदर्शन करें। दोनों संगठनों ने दृढ़तापूर्वक कहा कि अपनी मांगों के लिए लड़ना एक संवैधानिक लोकतांत्रिक अधिकार है और केवल वही राष्ट्र लोकतांत्रिक कहला सकता है जो विभिन्न वर्गों को यूनियन बनाने और अपने अधिकारों के लिए लड़ने की अनुमति देता है।

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एटक तेलंगाना राज्य सम्मेलन में उठी श्रम संहिताओं को रद्द करने और न्यूनतम वेतन 31000 रुपये करने की मांग

पहले ट्रेड यूनियनों की मांग 26000 रुपये की थी, लेकिन वर्तमान में रोजमर्रा की जरूरी चीजों की कीमतें जिस तरह जेट विमान की रफ्तार से आसमान छू रही हैं, उसे देखते हुए पुरानी मांग नाकाफी है।

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