अमरजीत कौर
ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एटक) ने इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस (आई.सी.जे.) की 14 न्यायाधीशों की पीठ द्वारा दिए गए ऐतिहासिक सलाहकारी मत का अत्यंत आशावाद के साथ स्वागत किया है, जिसने निर्णायक रूप से उस सत्य की पुष्टि कर दी है जिसे दुनिया का मेहनतकश वर्ग हमेशा से जानता और मानता आया है। हड़ताल का अधिकार, संगठन की स्वतंत्रता से संबंधित आईएलओ कन्वेंशन संख्या 87 का एक आवश्यक और संरक्षित हिस्सा है।
यह फैसला वैश्विक पूंजी और नव-उदारवादी नीतियों के उन निर्माताओं के लिए करारा जवाब है, जिन्होंने अपना पूरा समय मजदूर वर्ग को विखंडित करने और उसके सामूहिक संघर्षों को अपराध घोषित करने में लगाया। ऐसे समय में, जब पूंजीवादी बर्बरता मजदूरों को असुरक्षा और बदहाली की खाई में धकेल रही है तथा दूसरी ओर हड़तालों को अपराध बनाकर लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन कर रही है, यह फैसला कानूनी स्पष्टता और न्याय की पुनर्स्थापना करता है।
यह निर्णय उन नियोक्ताओं के आक्रामक अभियान पर निर्णायक प्रहार है, जिन्होंने एक दशक से अधिक समय तक यह तर्क दिया कि हड़ताल का अधिकार कन्वेंशन 87 में स्पष्ट रूप से “लिखा” नहीं गया है। अब अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय (आई.सी.जे. - इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ़ जस्टिस) ने इस तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि हड़ताल मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए उनकी वैध “गतिविधि” है। भारतीय मजदूर वर्ग के लिए यह फैसला एक बड़ी ताकत और औद्योगिक संबंध संहिता (आई.आर. कोड) को चुनौती देने का प्रभावशाली हथियार है, जो मूलतः हड़ताल के अधिकार को नकारती है।
एटक, विश्व ट्रेड यूनियन संगठनों — वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ ट्रेड यूनियन्स (डब्ल्यू.एफ.टी.यू.) तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों — को हार्दिक बधाई और क्रांतिकारी सलाम पेश करता है, जिन्होंने विश्व मजदूर वर्ग के संघर्षशील अग्रदूत के रूप में लगातार इस परिणाम के लिए संघर्ष किया।
एटक इसे अत्यंत गंभीर चिंता का विषय मानता है कि भारत, जो आई.एल.ओ. (इंटरनेशनल लेबर ऑर्गनाइजेशन) का संस्थापक सदस्य तथा मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (यू.डी.एच.आर.) का हस्ताक्षरकर्ता है, उसने सात दशकों से भी अधिक समय बीत जाने के बावजूद कन्वेंशन 87 (संगठन की स्वतंत्रता) और कन्वेंशन 98 (सामूहिक सौदेबाजी) का अनुमोदन नहीं किया है। वर्ष 2015 से अब तक भारतीय श्रम सम्मेलन भी आयोजित नहीं किया गया है, जैसा कि आई.एल.ओ. कन्वेंशन 144 में निर्धारित है।
एटक मांग करता है कि भारतीय संसद बिना किसी ऐसी शर्त या सीमा के, जो हड़ताल के अधिकार को कमजोर करती हो, तुरंत आईएलओ कन्वेंशन 87 और 98 का अनुमोदन करे। हम औद्योगिक संबंध संहिता के उन प्रावधानों को समाप्त करने की मांग करते हैं, जो अनिवार्य मध्यस्थता थोपते हैं और विरोध के अधिकार को सीमित करते हैं। साथ ही, हड़तालों के आयोजन के कारण गिरफ्तार किए गए सभी ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं की बिना शर्त रिहाई, उनकी सेवाओं की बहाली तथा सेवा संबंधी सभी लाभों की पुनर्स्थापना की भी मांग करते हैं।
आई.सी.जे. का यह मत भले ही “सलाहकारी” हो, लेकिन भारतीय मजदूर वर्ग के लिए यह संघर्ष को और तेज करने का आह्वान है। कानूनी लड़ाई जीत ली गई है; अब संगठनात्मक संघर्षों को और मजबूत करना होगा। आई.सी.जे. के इस फैसले ने साबित कर दिया है कि सत्ता दमन कर सकती है, लेकिन न्याय को पराजित नहीं कर सकती ।





