डॉ. अरुण मित्रा
व्यावसायिक स्वास्थ्य और सुरक्षा लंबे समय से स्वास्थ्य कर्मियों तथा श्रमिक संगठनों के लिए गंभीर चिंता का विषय रही है। इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति के दौरान छोटे-छोटे बच्चों से चिमनियाँ साफ करवाई जाती थीं और खतरनाक उद्योगों में काम करवाया जाता था। नतीजतन कई बच्चे गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाते थे और कम उम्र में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते थे। लेकिन उसके बाद से इंग्लैंड बहुत आगे बढ़ चुका है। वहाँ सभी बच्चे स्कूल जाते हैं, उन्हें उचित पोषण और स्वास्थ्य सुविधाएँ मिलती हैं। हम अपने देश में अभी भी इस लक्ष्य से बहुत दूर हैं।
2007 में जिनेवा में हुई 60वीं विश्व स्वास्थ्य सभा ने “वर्कर्स हेल्थ: ग्लोबल प्लान ऑफ एक्शन” तैयार किया था। इसमें माना गया है कि विश्व की आधी आबादी श्रमिक हैं और आर्थिक-सामाजिक विकास में उनका सबसे बड़ा योगदान है, लेकिन उनमें से बहुत कम को ही व्यावसायिक स्वास्थ्य सेवाएँ उपलब्ध हैं।
अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के अनुसार हर साल विश्व भर में 20.2 लाख यानी कुल मौतों का 3.6 प्रतिशत मौतें कार्य-संबंधी दुर्घटनाओं या बीमारियों के कारण होती हैं और इसके परिणामस्वरूप विश्व की वार्षिक जीडीपी का 4 प्रतिशत नष्ट हो जाता है।
भारत में इंडियन पॉपुलेशन क्लॉक के अनुसार हर साल लगभग 97 लाख मौतें होती हैं। इनमें से करीब 48,000 श्रमिकों की मौतें (कुल मौतों का 4.8 प्रतिशत ) व्यावसायिक दुर्घटनाओं के कारण होती हैं। निर्माण क्षेत्र में सबसे ज्यादा 24.20 प्रतिशत मौतें होती हैं। इनमें से अधिकांश दुर्घटनाएँ ठोस रोकथाम, रिपोर्टिंग और निरीक्षण व्यवस्था लागू करने से रोकी जा सकती हैं।
भारत में लगभग 54 करोड़ श्रमिक हैं। इनमें से केवल 3 प्रतिशत सरकारी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में हैं, जिन्हें सामाजिक सुरक्षा प्राप्त है। बाकी श्रम बल में भी बहुत कम लोग संगठित क्षेत्र में हैं, जबकि 93 प्रतिशत श्रमिक असंगठित क्षेत्र में हैं। सरकारी और सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मियों को छोड़कर कुल श्रम बल का केवल 11 प्रतिशत ही सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के दायरे में आता है। इसलिए व्यावसायिक सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सुझाया था कि विभिन्न क्षेत्रों के बीच समन्वय तंत्र विकसित किए जाएँ। यह जरूरी है क्योंकि अलग-अलग क्षेत्रों में स्वास्थ्य पर अलग-अलग प्रभाव पड़ता है। खनन में काम करने वाले विशेष पदार्थों के संपर्क में आने से संबंधित बीमारियों के शिकार होते हैं। परमाणु उद्योग में रेडिएशन का खतरा होता है। अस्पताल के कर्मी संक्रामक रोगों के संपर्क में आते हैं। निर्माण श्रमिकों को चोट लगने की अधिक संभावना रहती है। सीवर में काम करने वाले जहरीली गैसों और अपशिष्ट के संपर्क में रहते हैं। रोकथाम, उपचार और मुआवजे के तरीके भी क्षेत्र के अनुसार अलग होते हैं। उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों और कम सेवा प्राप्त करने वाले कमजोर श्रमिक समूहों (जैसे युवा व बुजुर्ग श्रमिक, विकलांग, प्रवासी श्रमिक) पर विशेष ध्यान देना चाहिए तथा लैंगिक पहलुओं का भी ध्यान रखना चाहिए।
29 सितंबर 2020 को अधिसूचित श्रम संहिता - व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशा संहिता, 2020 (ओएसएच और डबल्यूसी) ने श्रमिक सुरक्षा के कई महत्वपूर्ण प्रावधानों को पूरी तरह नकार दिया है। यह प्रभावी प्रवर्तन और बड़ी संख्या में भारतीय श्रमिकों को कवरेज जैसे मूल मुद्दों को संबोधित करने में विफल रही है। इस संहिता ने कारखाना, खदान, बंदरगाह, निर्माण, परिवहन, बागान, ठेका श्रम और अंतर्राज्यीय प्रवासी श्रमिकों से संबंधित पहले के 13 केंद्रीय कानूनों को समेकित कर दिया है, जिससे प्रत्येक क्षेत्र की विशिष्टताओं को नजरअंदाज कर दिया गया है।
यह संहिता गैर-पंजीकृत प्रतिष्ठानों में काम करने वाले श्रमिकों (जो कुल प्रतिष्ठानों/श्रमिकों का 93 प्रतिशत से अधिक हैं) की चिंताओं को पूरी तरह अनदेखा करती है। सुपरवाइजर और मैनेजरों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है, जो अनैतिक है। संहिता को सभी श्रमिकों - चाहे किसी भी तरह का रोजगार हो, प्रशिक्षु/ट्रेनी भी - को कवर करना चाहिए क्योंकि वे भी जोखिम में रहते हैं; कई बार अनुभव की कमी के कारण नियमित कर्मियों से ज्यादा जोखिम में रहते हैं।
कृषि श्रमिक, घरेलू कामगार, सीवरेज कर्मी, नमक मजदूर, सिक्योरिटी गार्ड, वन कर्मी, आईटी कर्मचारी, कुरियर कर्मचारी, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता आदि श्रेणियों के हितों को भी लगभग नजरअंदाज किया गया है। स्पष्ट कारणों से महिला श्रमिकों के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए थी।
ओएसएच संहिता ने पहले के क्षेत्र-विशिष्ट कानूनों (जैसे फैक्ट्रीज एक्ट, माइंस एक्ट, कॉन्ट्रैक्ट लेबर एक्ट, इंटर-स्टेट माइग्रेंट वर्कमेन एक्ट आदि) में मौजूद कई कानूनी सुरक्षा उपायों को कमजोर कर दिया है। पुराने कानूनों में उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों के लिए विस्तृत अध्याय थे। नई व्यवस्था में नियोक्ताओं और सरकारों को अत्यधिक लचीलापन दे दिया गया है जबकि श्रमिकों के स्पष्ट और प्रवर्तनीय अधिकार छीन लिए गए हैं।
संधिता का लागू होना केवल 10 या इससे अधिक श्रमिकों वाले प्रतिष्ठानों पर होता है (खतरनाक व्यवसायों में कुछ अपवाद हैं)। कई राज्य ड्राफ्ट नियमों में “फैक्ट्री” की परिभाषा बदलकर बिजली के साथ 20 और बिना बिजली के 40 श्रमिक कर दी गई है (पहले क्रमशः 10 और 20 थे)। यह तकनीकी लगने वाला बदलाव लाखों श्रमिकों को संहिता की सुरक्षा से बाहर कर देता है। कपड़ा, गारमेंट, धातु, होजरी और खाद्य प्रसंस्करण जैसे क्षेत्रों में छोटी इकाइयाँ ही प्रमुख हैं। इन छोटी इकाइयों में असुरक्षित मशीनरी, खराब हवा, लंबे काम के घंटे और कल्याण सुविधाओं की कमी के कारण सबसे ज्यादा जोखिम होता है।
श्रम निरीक्षण व्यवस्था को कमजोर कर दिया गया है। इंस्पेक्टरों को अब “इंस्पेक्टर-कम- फेसिलिटेटर” कहा जा रहा है, यानी उनका काम सख्त प्रवर्तन के बजाय सलाह देना बन गया है। इससे निरीक्षण व्यवस्था लगभग बेमानी हो जाएगी।
ठेका और प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा अपर्याप्त है। अंतर्राज्यीय प्रवासी श्रमिक अधिनियम 1979 में विस्थापन भत्ता, यात्रा भत्ता और ठेकेदारों का पंजीकरण अनिवार्य था - वह कानून समाप्त कर दिया गया और उसकी मजबूत सुरक्षा व्यवस्था ओएसएच संहिता में पूरी तरह नहीं लाई गई। ठेका श्रमिकों के लिए भी लागू होने की सीमा बढ़ा दी गई और ठेकेदारों को लाइसेंस लेना आसान कर दिया गया, जिससे नियोक्ता अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं।
संधिता में कार्यपालिका को अत्यधिक नियम बनाने की शक्ति दे दी गई है - सुरक्षा मानक, कल्याण आवश्यकताएँ, सीमा निर्धारण, निरीक्षण नियम आदि लगभग सभी महत्वपूर्ण प्रावधान नियमों से बदले जा सकते हैं।
क्षेत्र-विशेष सुरक्षा प्रावधान खत्म हो गए हैं। बागान श्रम अधिनियम, बीड़ी-सिगार श्रमिक अधिनियम, मोटर परिवहन श्रमिक अधिनियम, डॉक श्रमिक अधिनियम आदि में काम के घंटे, कल्याण सुविधाएँ, आवास, चिकित्सा और सुरक्षा के क्षेत्र-विशेष विस्तृत प्रावधान थे - अब उन्हें सामान्य ढांचे में मिला दिया गया है जिससे प्रत्येक क्षेत्र के विशिष्ट जोखिम और परिस्थितियों को नजरअंदाज कर दिया गया है।
शिकायत निवारण तंत्र बहुत कमजोर कर दिया गया है। असुरक्षित काम की स्थिति में शिकायत दर्ज करने या राहत पाने का कोई मजबूत तंत्र नहीं है। सुरक्षा विवादों के लिए कोई स्वतंत्र प्राधिकरण नहीं है, निरीक्षण व्यवस्था भी कमजोर है। इससे उल्लंघन की रिपोर्टिंग कम हो जाएगी, खासकर ठेका और प्रवासी श्रमिकों में जो प्रतिशोध का डर रखते हैं।
लंबे काम के घंटे और लचीली शिफ्टों का मजबूत प्रावधान है। नाममात्र के लिए 48 घंटे का सप्ताह रखा गया है, लेकिन राज्य नियमों में 12-12 घंटे की शिफ्ट की अनुमति है। यह दशकों की मेहनत से हासिल 8 घंटे के कार्यदिवस के सिद्धांत का उलटफेर है। इन्फोसिस के चेयरमैन नारायण मूर्ति ने (शायद सरकार के इशारे पर) 70 घंटे और सुब्रमण्यम ने 90 घंटे सप्ताह की वकालत की थी। चिकित्सा विज्ञान ने शोध से सिद्ध कर दिया है कि हमारा शरीर लगातार 8 घंटे भी पूरी क्षमता से काम नहीं कर सकता क्योंकि हमारा “सर्कैडियन रिदम” (दैनिक जैविक चक्र) ऐसा नहीं होने देता। वैज्ञानिकों का मत है कि आदर्श कार्य समय लगभग 6 घंटे है और वह भी सुबह के समय अधिक केंद्रित।
स्वच्छ, स्वच्छता युक्त वातावरण, पीने का साफ पानी और अन्य सुविधाओं के अभाव में श्रमिक स्वस्थ नहीं रह सकते और अपनी पूरी क्षमता से योगदान नहीं दे सकते।
अब समय आ गया है कि श्रमिक यूनियनें, सामाजिक कार्यकर्ता, जागरूक नागरिक और राजनीतिक दल एकजुट होकर श्रमिकों के स्वस्थ जीवन के अधिकार की रक्षा करें और सरकार से व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशा संहिता, 2020 को तत्काल वापस लेने के लिए बाध्य करें।



