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युद्ध और मानसिक स्वास्थ्य: संघर्ष के अदृश्य घाव

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डॉ. अरुण मित्रा

दुनिया भर में चल रहे युद्धों ने पूरे के पूरे क्षेत्रों को मृत्यु, तबाही और विनाश के परिदृश्य में बदल दिया है। पहले के समय में युद्ध के मुख्य शिकार सैनिक हुआ करते थे, लेकिन आज यह वास्तविकता पूरी तरह बदल चुकी है। आधुनिक युद्ध, विशेषकर घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में, नागरिकों को सर्वाधिक प्रभावित करते हैं। कई संघर्षों में कुल हताहतों में नागरिकों की हिस्सेदारी 50–90% तक होती है, और कुछ स्थितियों में नागरिकों और सैनिकों की मृत्यु का अनुपात 9:1 तक पहुँच गया है। यह बदलाव आधुनिक युद्ध की क्रूर प्रकृति को दर्शाता है, जहाँ आम लोग—महिलाएँ, बच्चे और बुजुर्ग—सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।

यूक्रेन में बड़े पैमाने पर हुई नागरिकों की मौतों ने एक बार फिर आधुनिक युद्ध के दूरगामी प्रभावों को उजागर किया है। टफ्ट्स यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन में जनस्वास्थ्य के सहायक प्रोफेसर बैरी एस. लेवी ने 'इंटरनेशनल फिजिशियंस फॉर द प्रिवेंशन ऑफ न्यूक्लियर वॉर' (IPPNW) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पारंपरिक युद्धों के गंभीर स्वास्थ्य प्रभावों के बारे में चेतावनी दी। उनके अनुसार, युद्ध के कारण व्यापक स्तर पर कुपोषण फैलता है (विशेषकर महिलाओं और बच्चों में) और संक्रामक बीमारियों जैसे दस्त, हैजा, श्वसन संक्रमण और तपेदिक (टीबी) के मामलों में तेज़ी से वृद्धि होती है।

इसके साथ ही मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ—जैसे अवसाद, पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर (PTSD) और आत्महत्या के मामले—भी काफी बढ़ जाते हैं। प्रजनन स्वास्थ्य पर इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है और स्वास्थ्य सेवाओं के बाधित होने के कारण हृदय रोग, कैंसर और किडनी रोग जैसी गैर-संक्रामक बीमारियाँ भी गंभीर रूप ले लेती हैं। यूक्रेन जैसे देशों में, जहाँ जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा बुजुर्गों का है, इन कारणों से होने वाली अप्रत्यक्ष मौतें सीधे हिंसा से होने वाली मौतों से कहीं अधिक हो सकती हैं।

पश्चिम एशिया में जारी हालिया संघर्ष, युद्ध की मानवीय कीमत को और अधिक स्पष्ट करता है। गाज़ा में इज़राइली हमले के परिणामस्वरूप कथित तौर पर 70,000 से अधिक लोगों की मृत्यु हुई है, जिनमें 20,000 से अधिक बच्चे शामिल हैं। निर्दोष लोगों की इस तरह की मौत का कोई औचित्य नहीं हो सकता। घायल और आघातग्रस्त बच्चों की तस्वीरें और वीडियो—जिनमें से कई ने अपने परिजनों को खो दिया है—गहराई से विचलित करने वाले हैं। ये केवल भौतिक विनाश का प्रमाण नहीं हैं, बल्कि एक गंभीर मानसिक स्वास्थ्य संकट का संकेत भी हैं।

युद्ध केवल विस्फोटों तक सीमित नहीं होता। इसके अप्रत्यक्ष प्रभाव—जैसे खाद्य आपूर्ति में बाधा, आवश्यक वस्तुओं की कमी तथा संचार और परिवहन प्रणालियों का ठप होना—लड़ाई समाप्त होने के बाद भी लंबे समय तक बने रहते हैं। ये प्रभाव भौगोलिक सीमाओं से परे भी फैलते हैं। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने वैश्विक ऊर्जा संकट को जन्म दिया है, जिससे हजारों किलोमीटर दूर स्थित देश भी प्रभावित हो रहे हैं। भारत में भी ईंधन की कमी की आशंका और एलपीजी के लिए लंबी कतारों जैसी स्थितियों ने आम लोगों में तनाव और चिंता बढ़ा दी थी, जो यह दर्शाता है कि युद्ध का मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव युद्धक्षेत्र से कहीं अधिक व्यापक होता है।

विस्थापन भी युद्ध का एक बड़ा और दुखद परिणाम है। एक अनुमान के अनुसार, ईरान में लाखों लोग आंतरिक रूप से विस्थापित हुए हैं और लेबनान में दस लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए हैं। ये लोग बुनियादी आवश्यकताओं—आवास, पोषण, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं—से वंचित हैं। शरणार्थी शिविरों का जीवन उन्हें गंभीर स्वास्थ्य जोखिमों के संपर्क में लाता है, जिनमें भुखमरी से जुड़ी बीमारियाँ, दस्त, श्वसन संबंधी बीमारियां और वायरल संक्रमण शामिल हैं। मधुमेह और हृदय रोग जैसी पुरानी बीमारियों का इलाज अक्सर नहीं हो पाता, जिससे ऐसी मौतें होती हैं जिन्हें रोका जा सकता था।

शारीरिक बीमारियों से परे, युद्ध का मनोवैज्ञानिक प्रभाव और भी अधिक विनाशकारी होता है। हिंसा के लगातार संपर्क में रहने से गहरा और दीर्घकालिक आघात उत्पन्न होता है। जो बच्चे मौत और विनाश को अपनी आँखों से देखते हैं या अपने परिजनों को खो देते हैं, उनमें लंबे समय तक रहने वाली भावनात्मक समस्याएँ विकसित हो जाती हैं। उनके भीतर भय, असहायता और असुरक्षा की भावनाएँ घर कर जाती हैं। कई लोग PTSD, चिंता और अवसाद से पीड़ित हो जाते हैं। उनमें यह डर लगातार बना रहता है कि वे या उनके प्रियजन अगले हमले में जीवित बचेंगे या नहीं। ऐसी परिस्थितियों में मानसिक और व्यवहार संबंधी विकार—जैसे नशे की लत और आत्मघाती प्रवृत्तियाँ—तेजी से बढ़ते हैं।

हिंसा का दीर्घकालिक प्रभाव सभी आयु वर्गों पर पड़ता है। हिंसा का सामना करने वाली महिलाएँ शारीरिक चोटों के साथ-साथ अवसाद और आत्मघाती विचारों जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से अधिक प्रभावित होती हैं। वहीं बुजुर्गों को, जिन्हें अक्सर संकट की स्थितियों में नजरअंदाज कर दिया जाता है, शोषण, तनाव और चिंता के उच्च जोखिम का सामना करना पड़ता है।

इन भयावह परिस्थितियों के बावजूद, मानवीय अदम्य जीवटता कायम रहती है। जीवित रहने की प्रवृत्ति मानवता की सबसे मजबूत विशेषताओं में से एक है। हिटलर के यातना शिविरों से बच निकले प्रसिद्ध मनोचिकित्सक (Psychiatrist) विक्टर फ्रैंकल ने दिखाया था कि सबसे कठिन परिस्थितियों में भी आशा जीवन को बनाए रख सकती है। उनके कार्यों ने यह सिद्ध किया कि जीवन का कोई उद्देश्य और धैर्य, व्यक्ति को अत्यधिक कठिनाइयों से उबरने में मदद कर सकते हैं।

आज युद्धग्रस्त क्षेत्रों में, विशेष रूप से गाज़ा जैसे स्थानों पर काम कर रहे स्वास्थ्यकर्मी इसी धैर्य का जीवंत उदाहरण हैं। अकल्पनीय परिस्थितियों में काम करते हुए भी वे जीवन बचाने और लोगों में आशा जगाने का कार्य जारी रखे हुए हैं। उनके प्रयास हमें याद दिलाते हैं कि विनाश के बीच भी मानवता जीवित रहती है।

युद्ध केवल एक भू-राजनीतिक घटना नहीं है; यह एक गंभीर जनस्वास्थ्य संकट है, विशेषकर मानसिक स्वास्थ्य के संदर्भ में। इसके निशान केवल धरती पर ही नहीं, बल्कि लोगों के मन-मस्तिष्क में भी गहराई तक अंकित हो जाते हैं। इन अदृश्य घावों का उपचार उतना ही आवश्यक है जितना कि तबाह हुए भौतिक ढांचे का पुनर्निर्माण।

पश्चिम एशिया में जारी युद्ध के परमाणु संघर्ष में बदलने का गंभीर खतरा मंडरा रहा है। संयुक्त राज्य अमेरिका और इज़राइल, दोनों के लिए हार स्वीकार करना कठिन है, जिससे तनाव के और अधिक बढ़ने की आशंका है। यदि स्थिति और बिगड़ती है, तो किसी भी पक्ष द्वारा परमाणु हथियारों का उपयोग वैश्विक तबाही ला सकता है।

इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि परमाणु हथियारों के उन्मूलन की दिशा में तत्काल और ठोस कदम उठाए जाएँ। वर्तमान में, संयुक्त राष्ट्र ही एकमात्र ऐसी वैश्विक संस्था है जो इस तनाव को कम करने में सक्षम है। उसे पहल करते हुए युद्धरत पक्षों को वार्ता की मेज पर लाना चाहिए और संघर्ष के शांतिपूर्ण समाधान को बढ़ावा देना चाहिए।

जो देश सीधे तौर पर इस युद्ध में शामिल नहीं हैं, लेकिन इसके अप्रत्यक्ष प्रभावों का सामना कर रहे हैं, उन्हें संयुक्त राष्ट्र के प्रयासों को मजबूत करने और इस युद्ध को समाप्त कराने में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए।

अंततः, संदेश बिल्कुल स्पष्ट है: कोई भी समाज युद्ध की मानवीय और मानसिक कीमत वहन नहीं कर सकता। शांति केवल एक राजनीतिक आवश्यकता नहीं है, बल्कि यह एक जनस्वास्थ्य संबंधी अनिवार्यता भी है।

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