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सांप्रदायिक दबाव में कटरा मेडिकल कॉलेज को बंद करना एक खतरनाक मिसाल

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कटरा मेडिकल कॉलेज को सांप्रदायिक दबाव में बंद करना संविधान, मेरिट और संस्थागत स्वायत्तता पर गंभीर आघात है। यह फैसला चिकित्सा शिक्षा के सांप्रदायिकीकरण की खतरनाक मिसाल है, जिसे तत्काल वापस लिया जाना चाहिए।

डॉ. अरुण मित्रा

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का कटरा स्थित मेडिकल कॉलेज के बंद होने पर खुलेआम जश्न मनाना बेहद परेशान करने वाला था। जब पूरे देश में लोग उन्नत चिकित्सा सुविधाओं को अपने घरों के करीब लाने के लिए अधिक मेडिकल कॉलेज खोलने की मांग कर रहे हैं, तब यह फैसला जनहित के पूरी तरह विपरीत है। यही वजह है कि पिछले साल कटरा मेडिकल कॉलेज को अनुमति मिलने पर व्यापक स्वागत हुआ था।

यह कॉलेज श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड द्वारा संचालित है और ट्रस्ट तथा सरकार के दोहरे प्रशासनिक ढांचे के तहत कार्य करता है। श्राइन बोर्ड पहले से कई संस्थानों का कुशलतापूर्वक संचालन कर रहा है, जो जनता की अच्छी सेवा कर रहे हैं। हर साल लाखों श्रद्धालु श्री माता वैष्णो देवी मंदिर में दर्शन करते हैं और दान देते हैं, जिनका उपयोग जनकल्याणकारी कार्यों—शैक्षिक और स्वास्थ्य संस्थानों सहित—में होता है।

नए स्थापित मेडिकल कॉलेज का नाम श्री माता वैष्णो देवी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस (एसएमवीडीआईएमई) रखा गया था। संवैधानिक सिद्धांतों और स्थापित प्रवेश नियमों के अनुसार, 50 सीटों पर प्रवेश पूरी तरह मेरिट के आधार पर किए गए थे।

लेकिन आरएसएस-बीजेपी के सांप्रदायिक तत्वों का गुस्सा तब भड़क उठा जब मेरिट पर भर्ती हुए 50 छात्रों में से 42 मुस्लिम थे। इससे सांप्रदायिक उन्माद भड़का और असंवैधानिक मांग उठी कि कॉलेज में केवल हिंदू छात्रों को ही प्रवेश मिलना चाहिए तथा हिंदू धार्मिक ट्रस्ट से जुड़े संस्थान में मुस्लिमों की कोई जगह नहीं है। ऐसे तर्क भारत के धर्मनिरपेक्ष संविधान की जड़ों पर सीधा प्रहार हैं।

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने बाद में आधारभूत सुविधाओं में कथित कमियों का हवाला देकर कॉलेज को बंद करने का आदेश दिया। यह औचित्य आश्चर्यजनक और अविश्वसनीय है। कॉलेज को अनुमति हाल ही में मिली थी और पहली बैच के लिए प्रवेश था, जिसके लिए न्यूनतम आधारभूत सुविधाएं ही पर्याप्त होती हैं।

स्थापित प्रक्रिया के अनुसार, कमियां मिलने पर संस्थान को नोटिस जारी किया जाता है और सुधार का समय दिया जाता है। बार-बार चेतावनी के बाद ही बंदी का सहारा लिया जाता है। देश में कई मेडिकल कॉलेज आधारभूत सुविधाओं से वंचित हैं, लेकिन एनएमसी ने उनके प्रति कोई सख्ती नहीं दिखाई। इस मामले में कोई प्रक्रिया नहीं अपनाई गई।

अचानक बंदी केवल एक बहाना लगती है; असली कारण केंद्र में सत्ताधारी आरएसएस-बीजेपी द्वारा डाला गया तीव्र राजनीतिक और सांप्रदायिक दबाव प्रतीत होता है। इन ताकतों का बंदी पर सार्वजनिक जश्न इस निष्कर्ष को और पुष्ट करता है।

मेरिट पर भर्ती छात्रों की धार्मिक पहचान ही वह एकमात्र तथ्य है जिसने बीजेपी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) द्वारा राजनीति से प्रेरित सांप्रदायिक अभियान छेड़ने का बहाना दिया। उन्होंने खुलेआम तर्क दिया कि माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड द्वारा संचालित कॉलेज में प्रवेश केवल हिंदुओं तक सीमित होना चाहिए। यह तर्क असंवैधानिक, भेदभावपूर्ण और कानूनी रूप से अस्थिर है।

कटरा मेडिकल कॉलेज को अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त नहीं है, इसलिए प्रवेश में धार्मिक बहिष्कार की मांग गैरकानूनी और संविधान-विरोधी है। धर्म, जाति या समुदाय से परे मेरिट आधारित प्रवेश ही लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष शिक्षा व्यवस्था की आधारशिला है।

स्वास्थ्य पेशेवरों की संस्था इंडियन डॉक्टर्स फॉर पीस एंड डेवलपमेंट (आईडीपीडी) ने कॉलेज बंद करने की कड़ी आलोचना की है। आईडीपीडी ने इस फैसले को मनमाना, अन्यायपूर्ण और गहराई से चिंताजनक बताया है, जो मेरिट, संवैधानिक मूल्यों और संस्थागत स्वायत्तता की नींव पर चोट करता है।

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग एक स्वायत्त नियामक संस्था है और उसे केवल कानून, नैतिकता तथा जनहित के आधार पर कार्य करना चाहिए। सांप्रदायिक और राजनीतिक दबाव के आगे उसका झुकना दुर्भाग्यपूर्ण है और संस्थागत स्वायत्तता के क्षरण को लेकर गंभीर चिंता पैदा करता है।

ऐसा समर्पण एक खतरनाक मिसाल कायम करता है और चिकित्सा शिक्षा, सामाजिक सद्भाव तथा कानून के शासन के लिए गंभीर दीर्घकालिक परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

कॉलेज बंद करके एनएमसी ने निष्पक्ष और कानूनी रूप से भर्ती छात्रों को दंडित किया है और यह संदेश दिया है कि सांप्रदायिक विचार मेरिट को कुचल सकते हैं—जो संवैधानिक लोकतंत्र में अस्वीकार्य है।

इसलिए अत्यंत आवश्यक है कि कटरा मेडिकल कॉलेज को तत्काल पुनः खोला जाए और उसे पूरी तरह कानून के अनुसार कार्य करने दिया जाए। शिक्षा का सांप्रदायिकीकरण नहीं हो सकता; मेरिट को दंडित नहीं किया जा सकता; संवैधानिक संस्थाएं सांप्रदायिक दबाव के आगे नहीं झुक सकतीं।

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