नई दिल्ली : भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के राष्ट्रीय सचिव मंडल ने राज्यपालों द्वारा राज्य विधानसभाओं से पारित विधेयकों पर सहमति देने की प्रक्रिया से जुड़े राष्ट्रपति संदर्भ पर सुप्रीम कोर्ट की हालिया राय को लेकर गहरी निराशा व्यक्त की है। पार्टी का कहना है कि कोर्ट द्वारा राज्यपालों या राष्ट्रपति के लिए कोई समयबद्ध ढांचा तय न करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया और न्यायिक निगरानी को कमजोर करता है।
भाकपा ने याद दिलाया कि इसी वर्ष अप्रैल में सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा लंबे समय तक विधेयकों को रोककर रखने और उन्हें राष्ट्रपति के पास भेजने पर स्पष्ट आपत्ति जताई थी। पार्टी के अनुसार, वर्तमान राय उस महत्वपूर्ण सुरक्षा कवच को कमजोर करती है जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि निर्वाचित विधायिकाओं की इच्छा को प्रक्रियात्मक देरी या विवेकाधीन निष्क्रियता से बाधित न किया जाए।
देश का संघीय ढांचा पहले ही बढ़ते केंद्रीकरण के कारण दबाव में है, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट की इस राय का अनपेक्षित असर यह हो सकता है कि राज्यपाल, खासकर विपक्ष-शासित राज्यों में, बिना किसी जवाबदेही के विधायी फैसलों को लंबित रखने के लिए प्रोत्साहित हों। स्पष्ट समयसीमा के अभाव में ऐसी निष्क्रियता लोकतांत्रिक जनादेश को कमजोर करती है और राज्य सरकारों की नीतिगत प्राथमिकताओं को प्रभावित करती है।
भाकपा ने सुप्रीम कोर्ट से अपनी राय पर पुनर्विचार करने की अपील की है ताकि लोकतांत्रिक और सहकारी संघवाद को मजबूत किया जा सके। साथ ही पार्टी ने संसद से भी आग्रह किया है कि वह राज्यपालों के बढ़ते हस्तक्षेप पर व्यापक चर्चा शुरू करे और इस औपनिवेशिक युग के गैर-निर्वाचित पद पर प्रभावी नियंत्रण के उपाय विकसित करे।
राज्य सरकारों की स्वायत्तता और जनता के जनादेश की सर्वोच्चता देश की संवैधानिक व्यवस्था का मूल तत्व है, और इसे किसी भी तरह से कमजोर नहीं किया जाना चाहिए।





