नई दिल्ली, 27 मार्च 2026: केंद्रीय ट्रेड यूनियनों, स्वतंत्र क्षेत्रीय फेडरेशनों और एसोसिएशनों के संयुक्त मंच ने 27 मार्च 2026 को प्रेस विज्ञप्ति जारी कर देश भर की ट्रेड यूनियनों से आह्वान किया है कि वे 1 अप्रैल को 'काला दिवस' के रूप में मनाएं । यह विरोध प्रदर्शन केंद्र सरकार द्वारा लाई जा रही चार श्रम संहिताओं के खिलाफ 1 अप्रैल 2026 को किया जाएगा ।
यूनियनों के अनुसार, 1 अप्रैल वह पहले से घोषित तिथि है जिस दिन केंद्र सरकार इन चार श्रम संहिताओं के कार्यान्वयन के लिए केंद्रीय नियमों की अधिसूचना जारी करने वाली है। ट्रेड यूनियनें लगातार इन श्रम-विरोधी और नियोक्ता-समर्थक संहिताओं का विरोध कर रही हैं, जिन्हें सरकार ने तथाकथित ‘श्रम सुधार’ और “ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस” (व्यापार करने में आसानी) के नाम पर पेश किया है ।
मंच ने आरोप लगाया है कि 12 फरवरी की ऐतिहासिक आम हड़ताल के बाद भी केंद्र सरकार इन संहिताओं को वापस लेने या इस मुद्दे पर केंद्रीय ट्रेड यूनियनों के साथ कोई सार्थक बैठक करने से बच रही है । इसके अतिरिक्त, इन संहिताओं का मसौदा तैयार करने के समय से ही ट्रेड यूनियनों जैसे महत्वपूर्ण हितधारकों से कोई परामर्श नहीं किया गया । यूनियनों ने इस बात पर भी चिंता जताई है कि देश के कार्यबल के जीवन से जुड़े इतने गंभीर मुद्दे पर लंबे समय से भारतीय श्रम सम्मेलन भी नहीं बुलाया गया है । इसे अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों का सीधा उल्लंघन बताया गया है, जिनके प्रति भारत एक राष्ट्र के रूप में प्रतिबद्ध है ।
बयान में कहा गया है कि ये श्रम संहिताएँ देश के वास्तविक संपत्ति सृजनकर्ता यानी श्रमिकों को वापस ब्रिटिश औपनिवेशिक काल जैसी शोषणकारी परिस्थितियों में धकेलने का प्रयास हैं । श्रमिक वर्ग ने औपनिवेशिक काल के अत्यधिक शोषण के खिलाफ और स्वतंत्र भारत में भी 8 घंटे के कार्यदिवस, कार्यस्थल की सुरक्षा, यूनियन बनाने और संगठित होने के अधिकार, सामूहिक सौदेबाजी और हड़ताल के अधिकार के लिए कड़ा संघर्ष किया है । इसके साथ ही सम्मानजनक वेतन, सामाजिक सुरक्षा, ठेका श्रमिकों के नियमितीकरण, स्थायी कार्यों में ठेका प्रथा की समाप्ति, समान काम के लिए समान वेतन, और बोनस, ग्रेच्युटी व पेंशन जैसे अधिकारों के लिए भी लड़ाई लड़ी गई है ।
यूनियनों ने याद दिलाया कि 1926 के ट्रेड यूनियन अधिनियम के माध्यम से ही यूनियन बनाने के अधिकार को वैधानिक मान्यता मिली थी । ब्रिटिश काल से लेकर स्वतंत्र भारत तक, हमारे पूर्वजों के लगभग 150 वर्षों के संघर्ष के परिणामस्वरूप संसद द्वारा 44 केंद्रीय श्रम कानून और राज्यों द्वारा लगभग 150 कानून बनाए गए (चूंकि श्रम भारतीय संविधान की समवर्ती सूची का हिस्सा है)। आरोप है कि वर्तमान केंद्र सरकार इन श्रम संहिताओं के जरिए इन सभी ऐतिहासिक उपलब्धियों को समाप्त करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है ।
वक्तव्य में इन संहिताओं के कई कठोर प्रावधानों का विस्तार से जिक्र किया गया है:
इनमें ऐसे दमनकारी प्रावधान हैं जिनसे यूनियन बनाना और उसका पंजीकरण मुश्किल हो जाएगा, जबकि निरस्तीकरण आसान हो जाएगा ।
नियोक्ताओं के उल्लंघनों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया जा रहा है, जबकि इसके उलट ट्रेड यूनियन गतिविधियों को दंडनीय बनाया जा रहा है ।
कार्य समय (वर्किंग ऑवर्स) की सीमा को खुला छोड़ दिया गया है ताकि उसे मनमाने ढंग से बढ़ाया जा सके ।
श्रमिकों का हड़ताल करने का अधिकार लगभग समाप्त कर दिया गया है ।
फिक्स्ड टर्म रोजगार को सामान्य बनाया जा रहा है, मौजूदा सामाजिक सुरक्षा कानूनों को कमजोर किया जा रहा है और 'सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा' के झूठे दावों के बीच अधिक श्रमिकों को इसके दायरे से बाहर रखा जा रहा है ।
17 क्षेत्रीय श्रम कानूनों को समाप्त करके सुरक्षा मानकों से समझौता किया जा रहा है, जिससे भारी संख्या में श्रमिक व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य के अधिकार से वंचित हो जाएंगे ।
न्यूनतम वेतन कानूनों को कमजोर करके गरीबी रेखा से नीचे ‘राष्ट्रीय न्यूनतम वेतन’ लागू करने की कोशिश हो रही है ।
ये संहिताएँ संगठित क्षेत्र को असंगठित बनाने और असंगठित श्रमिकों को उनके अधिकारों से वंचित करने की दिशा में काम कर रही हैं ।
मंच का स्पष्ट कहना है कि इन संहिताओं के कई प्रावधान भारतीय संविधान की भावना, मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों (एफपीआरडब्ल्यू) के बिल्कुल विरुद्ध हैं ।
ऐसी गंभीर स्थिति में, ट्रेड यूनियनों और श्रमिक संगठनों ने स्पष्ट किया है कि उनके पास इन संहिताओं के खिलाफ संघर्ष जारी रखने और इनके क्रियान्वयन का कड़ा प्रतिरोध करने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं बचा है । 12 फरवरी 2026 की राष्ट्रव्यापी हड़ताल को सफल बनाने वाले श्रमिकों, किसानों और नागरिकों को सलाम करते हुए यूनियनों ने एक लंबी लड़ाई के लिए तैयार रहने का आह्वान किया है ।
इसी पृष्ठभूमि में 1 अप्रैल को देश भर के सभी कार्यस्थलों पर 'काला दिवस' मनाया जाएगा । इस विरोध को कई रचनात्मक रूपों में दर्ज किया जाएगा—जैसे काले बैज लगाना, हाथों या माथे पर काली पट्टी बांधना, लंच ब्रेक के दौरान विरोध प्रदर्शन, नारेबाजी, धरना-प्रदर्शन, जुलूस और साइकिल या मोटरसाइकिल यात्राएँ निकालना । इन कार्यक्रमों का आयोजन राज्य इकाइयों द्वारा संयुक्त या स्वतंत्र रूप से और संयुक्त किसान मोर्चा (एसकेएम) के समर्थन से किया जा सकता है ।
अंत में, केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने समाज के सभी वर्गों से अपील की है कि वे इस विरोध कार्यक्रम का समर्थन करें । उनका कहना है कि लोकतंत्र की असली कसौटी सामूहिक संगठन बनाने, सामूहिक सौदेबाजी करने और अपने वैध अधिकारों के लिए संघर्ष करने के अधिकार में ही निहित है, और इसे सुरक्षित रखना अत्यंत आवश्यक है ।
संयुक्त वक्तव्य जारी करने वाले संगठनों में इंटक, एटक, एचएमएस, सीटू, एआईयूटीयूसी, टीयूसीसी, सेवा, एआईसीसीटीयू, एलपीएफ और यूटीयूसी सहित देश के प्रमुख श्रमिक संगठन शामिल हैं ।




