रामनरसिम्हा राव
नारायणगुडा: "आज जब देश को जाति और धर्म के नाम पर बांटने की कोशिशें हो रही हैं, ऐसे समय में इप्टा (भारतीय जन नाट्य संघ) गीतों, नुक्कड़ नाटकों और लोक नृत्यों के जरिए लोगों में वैचारिक चेतना जगाकर देश को जोड़ने का काम कर रहा है।" यह बात इप्टा के चौथे तेलंगाना राज्य सम्मेलन के दौरान जुटे प्रख्यात सिनेमा कलाकारों, निर्देशकों और निर्माताओं ने कही।

25 मई से शुरू हुए इस दो दिवसीय सम्मेलन की शुरुआत बेहद शानदार रही। राज्य इप्टा कार्यालय से एक भव्य और रंगारंग जुलूस निकाला गया, जिसमें रंगमंच कलाकार, गायक, लोक नर्तक और शास्त्रीय नर्तक पारंपरिक वेशभूषा में शामिल हुए। करीब दो किलोमीटर लंबा यह जुलूस शहर के विभिन्न रास्तों से गुजरता हुआ नारायणगुडा के 'मार्वल फंक्शन हॉल' पहुंचा, जहां यह एक विशाल जनसभा में तब्दील हो गया। सम्मेलन परिसर में मशहूर फिल्म निर्माता व निर्देशक तम्माशेड्डी भारद्वाज ने इप्टा का ध्वजारोहण कर कार्यक्रम का विधिवत उद्घाटन किया। उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता इप्टा के राज्य महासचिव पल्ले नरसिम्हा ने की, जबकि मुख्य अतिथि के रूप में भाकपा के तेलंगाना राज्य सचिव व विधायक कूनामनेनी संबासिवा राव मौजूद रहे।

मुख्य अतिथि कुनामनेनी संबासिवा राव ने इप्टा के गौरवशाली इतिहास को रेखांकित करते हुए कहा कि तेलंगाना के ऐतिहासिक सशस्त्र संघर्ष से लेकर जातिगत भेदभाव, सामंती अत्याचारों और बंधुआ मजदूरी के खिलाफ लड़ाइयों तक, इप्टा ने हमेशा अग्रिम पंक्ति में रहकर भूमिका निभाई है। जहां भी आम जनता पर अन्याय हुआ, इप्टा के कलाकार उनके पीछे चट्टान की तरह खड़े रहे। जब शासक वर्ग ने इप्टा पर प्रतिबंध लगाया, तो इसके समर्पित कलाकार सिनेमा जगत की ओर मुड़े और वहां भी जनता के पसंदीदा बने। कला तो मानव सभ्यता के जन्म से है, लेकिन इप्टा ने इसे जनता के कल्याण के लिए एक संगठित रूप दिया। आज जितने भी सांस्कृतिक संगठन काम कर रहे हैं, इप्टा उन सबकी जननी है। उन्होंने कलाकारों से अपील की कि वे लगातार गांवों और बस्तियों में जाएं, जनता की समस्याओं को समझें और कला के माध्यम से न सिर्फ उन्हें उठाएं बल्कि उनका समाधान भी सुझाएं।
विशिष्ट अतिथि के रूप में बोलते हुए फिल्म निर्माता तम्माशेड्डी भारद्वाज ने कहा कि तेलंगाना को निजाम की निरंकुशता और तानाशाही से आजाद कराने में इप्टा का योगदान अद्वितीय था। इप्टा का अंतिम लक्ष्य एक ऐसे समाज का निर्माण करना है जहां किसी भी स्तर पर किसी का शोषण न हो। वहीं पूर्व विधायक चाडा वेंकट रेड्डी ने अपने संबोधन में कहा कि एक क्रांतिकारी गीत, बंदूक की गोली से भी अधिक धारदार और असरदार होता है। इप्टा ने ही शोषित समाज को अपने अधिकारों के लिए हथियार उठाने की प्रेरणा दी थी। यहां तक कि अलग तेलंगाना राज्य के गठन के आंदोलन में भी इसकी अहम भूमिका रही।

सम्मेलन के दूसरे दिन, मंगलवार को हैदराबाद के देशोद्धारक भवन में प्रतिनिधि सत्र का आयोजन किया गया, जिसकी अध्यक्षता कन्नम लक्ष्मीनारायण ने की। सत्र का उद्घाटन करते हुए भाकपा के राज्य सहायक सचिव ईटी नरसिम्हा ने कलाकारों को आगाह किया कि चूंकि सांप्रदायिक ताकतें अपने शासन को बनाए रखने के लिए देश में सांप्रदायिक तनाव पैदा कर रही हैं, इसलिए कलाकारों को हमेशा सतर्क रहना चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि इप्टा को सोशल मीडिया का पूरा उपयोग करना चाहिए और इसके माध्यम से प्रस्तुतियां देनी चाहिए ताकि हमारा संदेश व्यापक जनता तक पहुंचे। केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि मोदी द्वारा राष्ट्रीय संपत्ति को अडानी और अंबानी के हवाले किया जा रहा है, यही वजह है कि 96 प्रतिशत लोग उनका विरोध कर रहे हैं। मतदाता सूची के संशोधन की विशेष जांच के जरिए वे दोबारा सत्ता में आने का प्रयास कर रहे हैं और इप्टा को उनके इन कुकर्मों को उजागर करना चाहिए। उन्होंने मजलिस पार्टी का जिक्र करते हुए कहा कि जो पार्टी कभी केवल पुराने शहर तक सीमित थी, वह आज पूरे देश में फैल गई है, और यह आसानी से समझा जा सकता है कि उसे किसका समर्थन मिल रहा है। इस दौरान प्रजा नाट्य मंडली (सीपीएम) के कट्टा नरसिम्हा ने भी भ्रातृ संदेश (फेटरनल मैसेज) दिया।

इस सत्र के मुख्य अतिथि और तेलंगाना जन समिति के राज्य अध्यक्ष व एमएलसी प्रोफेसर कोदंडराम ने अपने संबोधन में कहा कि कलाकारों को अपनी कलाकृतियों को इस तरह विकसित करना होगा कि वे समाज को बदलने और सामाजिक बुराइयों को मिटाने के उद्देश्य से काम करें। उन्होंने कहा कि सामंती समाज में लोगों ने अपनी स्वतंत्रता खो दी थी, और वर्तमान में शासक वर्ग लोगों की भावनाओं का फायदा उठा रहा है। आज के कलाकारों को पुरानी पीढ़ी के बलिदानों से प्रेरणा लेनी चाहिए और आगे बढ़ना चाहिए।
इस ऐतिहासिक सम्मेलन में भाकपा के राज्य सचिवमंडल सदस्य कलावेनी शंकर, भागम हेमंत राव, वीएस बोस, राज्य कार्यकारिणी सदस्य बी. छाया देवी, हैदराबाद जिला सचिव बी. स्टालिन, राज्य अध्यक्ष श्रीनिवास, उप्पलय्या और पदाला नलिनी सहित कई गणमान्य विचारकों और सांस्कृतिक कर्मियों ने हिस्सा लिया और अपने विचार साझा किए।





