नसीरुल हक़
मुंबई, 19 मई 2026 : धारावी के पुनर्विकास प्रोजेक्ट को लेकर मुंबई की राजनीति और सामाजिक गलियारों में गरमाहट आ गई है। अडानी समूह की कंपनी 'नवभारत मेगा डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड' (एनएमडीपीएल) द्वारा किए गए हालिया सर्वे में 85 प्रतिशत से अधिक धारावी वासियों को अपात्र या अनिर्णीत घोषित किए जाने के खिलाफ 'धारावी बचाव आंदोलन' के बैनर तले एक विशाल 'जन आक्रोश मोर्चा' निकाला गया। यह प्रदर्शन विभिन्न राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय निवासियों के कड़े प्रतिरोध का प्रतीक बनकर उभरा है।

सोमवार, 4 मई 2026 को सुबह 11:30 बजे कुम्हारवाड़ा नाका स्थित बिस्मिल्लाह होटल के सामने से यह आक्रोश मोर्चा शुरू हुआ। 90 फीट रोड को पार करते हुए यह मोर्चा साहिल होटल के पास सायण-बांद्रा लिंक रोड नाका पर संपन्न हुआ। इसके बाद आंदोलन के प्रमुख नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने बांद्रा पूर्व स्थित झोपड़पट्टी पुनर्वास प्राधिकरण (एसआरए) कार्यालय जाकर कार्यकारी अधिकारी डॉ. महेंद्र कल्याणकार से मुलाकात की और अपनी 15 सूत्रीय मांगों का एक विस्तृत मांग पत्र सौंपकर चर्चा की।

इस प्रतिनिधिमंडल और मोर्चे में महाराष्ट्र विधानसभा के नेता प्रतिपक्ष अंबादास दानवे (शिवसेना), स्थानिक सांसद अनिल देसाई (शिवसेना), कांग्रेस सांसद सुश्री वर्षा गायकवाड़, स्थानीय विधायक ज्योति गायकवाड़, विधायक महेश सावंत, पूर्व विधायक बाबूराव माने, मुंबई की पूर्व महापौर किशोरी पेडनेकर और कई पूर्व नगरसेवक शामिल थे। इस आंदोलन को धार देने में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) और 'एटक' के कार्यकर्ताओं ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया, जिसका नेतृत्व सुकुमार दामले, नसीरुल हक और अन्य वरिष्ठ वामपंथी नेताओं ने किया। इसके अलावा राकांपा (शरद पवार), आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी और मनसे जैसी पार्टियों के समन्वयकों ने भी इसमें बढ़-चढ़कर भाग लिया।
धारावी एक 'वाइटल पब्लिक प्रोजेक्ट' (वीटीपी) है, इसलिए 4 अक्टूबर 2024 के गवर्नमेंट रेजोल्यूशन (जीआर) को रद्द कर नया जीआर निकाला जाए और सभी 6 सेक्टरों के लगभग 1 लाख 20 हजार झोपड़ों को पात्र घोषित किया जाए। सभी धारावी वासियों को धारावी के भीतर ही 500 स्क्वायर फीट का घर दिया जाए। बैठी चाल और बीएमसी की जमीन पर बने घरों को 750 स्क्वायर फीट जगह दी जाए। सभी दुकानों, कारखानों और लघु उद्योगों को धारावी में ही एक विशेष इकोनॉमिक जोन बनाकर पुनर्वासित किया जाए। पात्रता के लिए 31 दिसंबर 1999 की समय सीमा को हटाकर सर्वे की तारीख को ही अंतिम माना जाए या फिर मुंबई के अन्य हिस्सों की तरह 2011 की समय सीमा लागू की जाए।
निवासियों का आरोप है कि अडानी की कंपनी यह पुनर्विकास ठीक से नहीं कर सकती, इसलिए उसे हटाकर म्हाडा, एमएमआरडीए या सिडको जैसी विश्वसनीय सरकारी कंपनियों को यह काम सौंपा जाए। इसके अलावा धारावी कोलीवाड़ा, कुम्हारवाड़ा और राजीव गांधी नगर जैसी ऐतिहासिक और विशिष्ट बस्तियों को अलग स्कीम के तहत विकसित करने की मांग की गई है।
आंदोलनकारियों ने आरोप लगाया कि 2018 में महाविकास आघाड़ी सरकार के समय निकाले गए अंतर्राष्ट्रीय टेंडर में दुबई की कंपनी 'सेक्लिंक टेक्नोलॉजीज' ने 7400 करोड़ रुपये की उच्चतम बोली लगाकर टेंडर हासिल किया था। उस वक्त इसमें रेलवे की 48.7 एकड़ जमीन शामिल नहीं थी, जिसे तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के प्रयासों के बाद भी केंद्र सरकार ने अटकाए रखा था।
जैसे ही जून 2022 में महाविकास आघाड़ी की सरकार को गिराकर नई सरकार बनी, वह रेलवे की जमीन तुरंत प्रोजेक्ट को हस्तांतरित कर दी गई। आरोप है कि नियमों में फेरबदल कर पुराने टेंडर को रद्द किया गया और सितंबर 2022 में यह 600 एकड़ का विशाल प्रोजेक्ट अडानी रियल्टी को महज 5,069 करोड़ रुपये में सौंप दिया गया, जो बाजार मूल्य से करीब 3,000 करोड़ रुपये कम है। इसके अलावा, धारावी के अपात्र लोगों को बसाने के नाम पर मुंबई के विभिन्न हिस्सों (मुलुंड, कंजूरमार्ग, भांडुप, मानखुर्द, बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स और मालाड) में लगभग 1,371 एकड़ बेशकीमती जमीन अडानी समूह को मुफ्त में दे दी गई है, जिसकी अनुमानित कीमत 2 से 2.5 लाख करोड़ रुपये है।
आंदोलनकारियों का दावा है कि कंपनी के सर्वे में भारी भ्रष्टाचार हो रहा है। इसके लिए अनुबंध 2 जिम्मेदार है। उदाहरण के लिए, राजीव गांधी नगर की 400 झोपड़ियों में से केवल 23 को पात्र और 158 को अनिर्णीत रखकर बाकी सबको अपात्र कर दिया गया है। 'अनिर्णीत' की एक नई श्रेणी बनाकर अधिकारियों और बिचौलियों द्वारा कागजात के नाम पर मोटी रकम वसूलने के आरोप लगाए गए हैं।

धारावी बचाओ आंदोलन के आह्वान पर 60 प्रतिशत से अधिक झोपड़ीधारकों ने इस सर्वे का पूरी तरह बहिष्कार किया है और अपने घरों के कागजात देने से साफ इनकार कर दिया है। 13 कंपाउंड, कमला नगर, मछुआरा बस्ती (धारावी कोलीवाड़ा) और कुम्हारवाड़ा जैसे दर्जनों बड़े इलाकों ने सर्वे में सहयोग नहीं किया। निवासियों की स्पष्ट मांग है कि सरकार पहले लिखित में 'मकान के बदले मकान और दुकान के बदले दुकान' देने की गारंटी दे।
धारावी केवल एक झोपड़पट्टी नहीं, बल्कि एक 'मिनी इंडिया' है जहां देश के हर राज्य (विशेषकर उत्तर प्रदेश और बिहार) के लाखों मजदूर चमड़ा उद्योग, रेडीमेड गारमेंट, जरी काम, दक्षिण भारतीय फरसाण-इडली उद्योग और मिट्टी के बर्तन बनाने जैसे कार्यों से जुड़े हैं। यहाँ 10 हजार से ज्यादा छोटे-बड़े उद्योग स्थापित हैं जो अरबों रुपये की विदेशी मुद्रा भारत सरकार को कमाकर देते हैं।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि अडानी समूह कीं मंशा केवल 20-25 प्रतिशत लोगों को धारावी में रखकर बाकी 75-80 प्रतिशत लोगों को मुंबई के बाहरी इलाकों (मुलुंड, देवनार, मालाड आदि) में विस्थापित करने की है। इसके पीछे की योजना धारावी की इस कीमती जमीन पर 'बीकेसी-2' (शॉपिंग मॉल, बिजनेस सेंटर, फाइव स्टार होटल और कसीनो) बनाकर विदेशी बाजारों में बेचकर मुनाफा कमाने की है। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रोजेक्ट और मुंबई भर में महंगे दामों पर 'टीडीआर' (ट्रांसफरेबल डेवलपमेंट राइट) बेचने के विशेषाधिकार से अडानी समूह को 13 लाख करोड़ रुपये से अधिक का मुनाफा होने का अनुमान है।
यह प्रोजेक्ट नवभारत मेगा डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड (एनएमडीपीएल) नामक एक स्पेशल पर्पज व्हीकल (एसपीवी) के माध्यम से चलाया जा रहा है, जो झोपड़पट्टी पुनर्वास प्राधिकरण, धारावी पुनर्विकास प्राधिकरण और अडानी समूह का एक साझा उपक्रम है। इसके लिए मार्केट से फंड जुटाने के प्रावधान किए गए हैं।
दिसंबर 2022 से ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और अन्य लोकतांत्रिक संगठनों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। धारावी बचाव आंदोलन के नेताओं ने साफ किया कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, बल्कि वे ऐसा विकास चाहते हैं जिसमें धारावी के मूल निवासियों को वहीं पक्के मकान, स्कूल, अस्पताल और उनके रोजगार के लिए सुरक्षित स्थान मिले। आंदोलन ने देश की जनता और सभी राजनीतिक दलों से धारावी वासियों के इस अस्तित्व की लड़ाई में सहयोग करने की अपील की है।





