—बेबी शॉ
'कोमल गांधार' के एक दृश्य में, मंच पर खड़ा वृद्ध रिफ्यूजी भृगु बार-बार अपने छूटे हुए देश, पद्मा नदी और जीवन की आदतों को याद करते हुए पूछता है—“रिफ्यूजी क्यों बनूँ?” दूसरी आवाज़ उत्तर देती है—“रोटी मिलेगी, इसलिए जाओ उस पार, बाबुओं ने कागज़ में नाम दे दिया है—रिफ्यूजी।” पीछे पर्दे पर छाया की तरह लोग—बच्चे, बूढ़े, स्त्रियाँ—एक अंतहीन रास्ते पर उतरते चले जा रहे हैं। यह केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि टूटे हुए बंगाल की सामूहिक स्मृति, पीड़ा और प्रतिरोध का दृश्य-रूप है। जब भी ऋत्विक घटक की चर्चा होती है, यह दृश्य सबसे पहले याद आता है। क्योंकि घटक का सिनेमा केवल कथा नहीं कहता—वह इतिहास के घावों को दृश्य में बदल देता है। ऋत्विक घटक की पुस्तक 'चलचित्र, मानुष ओ आरो किछु' में भी इसी टूटे हुए भूगोल और मनुष्य की स्मृति का अन्वेषण मिलता है। उनके लेखों, स्वगत वक्तव्यों और आत्ममंथन में बार-बार यह प्रश्न उभरता है—देश क्या है ? क्या देश केवल एक राजनीतिक या प्रशासनिक संरचना है ? या वह हमारे बचपन की मिट्टी, माँ की गंध, गाँव का आँगन, और स्मृतियों का जीवंत संसार है ? अपने लेख 'कुछ खंड चिन्तन : या कुछ अनुभूतियाँ' में घटक लिखते हैं कि उनका बचपन पद्मा नदी के किनारे बीता—एक जीवंत, स्वप्निल संसार में। लेकिन वही संसार अब उनकी आँखों से ओझल हो चुका है—“जो देखा था, उसे दिखा नहीं पा रहा हूँ।” इस गहरी हताशा में ही उनका सिनेमा जन्म लेता है—एक खोई हुई दुनिया को पुनः रचने की असफल, किन्तु अनिवार्य कोशिश। उनके सिनेमा के चरित्र में भी यही त्रासदी दिखाई देती है। मशीन और आधुनिकता के बीच फँसा मनुष्य—जहाँ जीवन एक अंतहीन संघर्ष बन जाता है। एक पात्र का कहना—“मशीन उसे निगल नहीं पाई, यही अपेक्षित था।”—दरअसल उस सामाजिक नियति की ओर संकेत है, जिसमें पीड़ा ही सामान्य हो जाती है।

ऋत्विक घटक के लिए सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं था; वह एक भाषा की खोज था। एक ऐसी दृश्य-भाषा, जो कम बोले, पर गहराई से संकेत दे; जो संदर्भों के बोझ से दबे बिना स्मृतियों को जगा सके; जो archetypal स्तर पर मनुष्य के भीतर उतर सके। वे लिखते हैं कि यह भाषा यूरोप नहीं खोज पाएगा, हमें ही खोजनी होगी। उनकी दृष्टि में यह भाषा भारतीय अनुभव, विशेषतः विभाजन और विस्थापन की त्रासदी से जन्म लेती है। उन्होंने स्वयं कहा था, “मैंने अपनी फिल्मों में अपने देश और अपने लोगों के दुःख-दर्द और शोषण को चित्रित करने की कोशिश की है।” यह केवल कथन नहीं, बल्कि उनके समूचे सिनेमा का सार है। 'कोमल गांधार' के संदर्भ में घटक ने स्वयं कहा था कि ''यह 'मिलन' की कथा है—दो बंगाल के पुनर्मिलन की आकांक्षा। जब तक यह मिलन नहीं होगा, तब तक 'टूटा हुआ बंगाल' अधूरा रहेगा।'' इसीलिए उनके सिनेमा में प्रेम भी है, लेकिन वह प्रेम एक गहरे ऐतिहासिक घाव के भीतर से जन्म लेता है। आज, जब ऋत्विक घटक की जन्मशती पार हो चुकी है, यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो उठता है—क्या हम उस भाषा की खोज कर पाए हैं, जिसकी तलाश में वे जीवन भर भटकते रहे ? क्या बंगाली सिनेमा (और व्यापक रूप से भारतीय सिनेमा) केवल कथा कहने की परम्परा से आगे बढ़कर एक स्वायत्त दृश्य-भाषा रच पाया है ? ऋत्विक घटक का सिनेमा हमें इसी असुविधाजनक प्रश्न के सामने खड़ा करता है। वह हमें झकझोरता है—और पूछता है: “क्या हम सचमुच खोज रहे हैं ?”
साहित्य, चित्रकला, यहाँ तक कि संगीत में नई भाषा की खोज जनता की स्वीकृति पर उतनी निर्भर नहीं होती। बहुत कम खर्च में कलाकार अपने प्रयोग कर सकता है। लेकिन रंगमंच, थियेटर या सिनेमा—ये माध्यम भारी निवेश की माँग करते हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है—निर्माता पैसा क्यों लगाए, अगर दर्शक उस भाषा को स्वीकार ही न करें ? और दर्शक क्यों स्वीकार करेगा, यदि वह उस भाषा को समझ ही न पाए ? “अंडा पहले या मुर्गी”—इस तरह का द्वंद्व पिछले सत्तर वर्षों से सिनेमा के इतिहास में घूमता रहा है। यह अधूरापन ही ऋत्विक घटक के कला-चिन्तन की गहराई को उजागर करता है। उनके लिए सिनेमा केवल मनोरंजन नहीं था; वह समय, इतिहास और स्मृति की जटिल परतों को अभिव्यक्त करने का माध्यम था। वे एक ऐसी भाषा की तलाश में थे, जो कम बोले, लेकिन गहराई से संकेत दे; जो बिना किसी बाहरी बोझ के भी दर्शक के भीतर स्मृति और संवेदना को जगा सके। हम सामान्यतः ऋत्विक घटक को एक विशेष छवि में देखते हैं—एक जीनियस, लेकिन साथ ही एक मद्यप; एक ऐसा कलाकार जिसकी रचनाएँ कभी बिखरी हुई, तो कभी दैवी प्रेरणा से उपजी लगती हैं। यह दृष्टिकोण हमें सहज और सुरक्षित बनाता है, क्योंकि इससे हम उनकी असफलताओं को उनकी व्यक्तिगत कमजोरियों पर डाल सकते हैं। लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक जटिल है। ऋत्विक घटक मूलतः एक गहरे राजनीतिक कलाकार थे। उनकी सृजनात्मकता का केन्द्र राजनीति थी, और उनकी ऊर्जा का स्रोत था उनका वैचारिक बोध। मार्क्सवाद और कार्ल युंग के 'सामूहिक अवचेतन' के सिद्धांत—इन दोनों के अनोखे समन्वय ने उनके सिनेमा को आकार दिया। इसीलिए उनकी हर फिल्म एक तरह से वैचारिक निबंध की तरह है, जहाँ समय, स्मृति, इतिहास और अस्तित्व एक साथ संवाद करते हैं।
आज, जब हम उनकी जन्मशती पार कर चुके हैं, यह प्रश्न और भी तीखा होकर सामने आता है—क्या हमने उस भाषा की खोज की है, जिसकी तलाश में उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया ? हम, जो उनके बारे में शब्दों में बात करते हैं—क्या कभी उस 'अनकहे' को छूने की कोशिश करेंगे ? जहाँ उनका सिनेमा ठहर जाता है, लेकिन वहीं से हमारी सोच शुरू होती है। ऋत्विक कुमार घटक ने एक बार कहा था कि ''वे सिनेमा के प्रेम में नहीं पड़े।''—और यह कथन एक अर्थ में, उनके बर्टोल्ट ब्रेख्त के शिष्य होने की स्वाभाविक परिणति था। ब्रेख्तीय सौन्दर्यशास्त्र दर्शक को किसी कला माध्यम में डूब जाने नहीं देता; वह उसे लगातार सचेत रखता है। ताकि उसका ध्यान कला के भावनात्मक सम्मोहन से हटकर उसके विचार और कथ्य पर केन्द्रित हो। इस दृष्टि से ऋत्विक का यह कथन पूरी तरह 'राजनीतिक रूप से सही' प्रतीत होता है। लेकिन यदि हम उनके साक्षात्कारों को गहराई से पढ़ें, तो एक अलग ही तस्वीर सामने आती है। वहाँ हम देखते हैं कि सिनेमा को देखने और आत्मसात करने की प्रक्रिया में वे अपने समय के कितने सजग और व्यापक रूप से जुड़े हुए थे। वे केवल फ़िल्मकार नहीं थे; वे सिनेमा के गम्भीर छात्र भी थे।
अपने साक्षात्कारों में ऋत्विक बार-बार सिनेमा के इतिहास को याद करते हैं और समकालीन फ़िल्मों को उसी संदर्भ में समझने की कोशिश करते हैं। उनकी प्रिय फ़िल्मों में बैटलशिप पोटेमकिन का नाम प्रमुख है, जहाँ सर्गेई आइज़ेनस्टाइन ने अपने प्रसिद्ध मोंटाज सिद्धांत को लगभग एक पाठशाला की तरह स्थापित किया। उनके प्रिय निर्देशकों में लुइस बुनुएल, पियर पाओलो पासोलिनी, और फेदेरिको फेलिनी शामिल थे। वे कार्ल थियोडोर ड्रेयर की 'द पैशन ऑफ जोन ऑफ आर्क' बार-बार देखते थे। पासोलिनी की 'द गॉस्पेल अकॉर्डिंग टू सेंट मैथ्यू' और फेलिनी की 'ला डोल्चे वीटा' उनकी अत्यन्त पसंदीदा फ़िल्मों में थीं। फ्रॉंसीसी नुवेल वाग (Nouvelle Vague) पर भी उनकी स्पष्ट राय थी। 'द ब्लोज़' को वे नुवेल वाग का प्रतिनिधि नहीं मानते थे, लेकिन उसे “बहुत अच्छी फ़िल्म।” कहते थे। जाँ-ल्यूक गोदार को वे “स्ट्रीट फाइटर, पूरी तरह वामपंथी।” कहते थे। साथ ही वे अलां रॉब-ग्रिये और गोदार के बीच सम्बन्धों को समझने की कोशिश करते थे—जिससे यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने 'लास्ट ईयर ऐट मारिएनबाद' भी देखी थी। इसी तरह वे सोवियत सिनेमा की नई पीढ़ी से भी परिचित थे। स्पष्ट है कि ऋत्विक घटक का सिनेमा-दृष्टिकोण किसी एक परम्परा तक सीमित नहीं था; वह विश्व सिनेमा के साथ गहरे संवाद में था। लेकिन इन सबके ऊपर था उनका जीवनबोध—उनका आदर्श, जिससे वे कभी विचलित नहीं हुए, चाहे इसके लिए उन्हें कितना ही व्यक्तिगत और पेशेवर नुकसान क्यों न उठाना पड़ा हो। यह आदर्श मनुष्य के पक्ष में था—मज़दूर, किसान, विस्थापित, वेश्या और बच्चे—समाज के हाशिए पर खड़े वे सभी लोग, जिन्हें मुख्यधारा अक्सर अनदेखा कर देती है। जैसा कि ऋत्विक ने स्वयं कहा था—“...बीच में मेकअप से सजी-धजी औरतें और कुछ काल्पनिक पुरुष पात्रों के आधार पर एक स्वप्नलोक रच दिया जाता है।”
ठीक इसी बिन्दु पर ऋत्विक घटक का सिनेमा आज भी अत्यन्त प्रासंगिक हो उठता है। उनके सिनेमा में किसी कृत्रिम स्वप्नलोक की जगह नहीं है—वहाँ केवल मनुष्य है—घाट-घाट पर, हर मोड़ पर—मनुष्य, मनुष्य और सिर्फ़ मनुष्य। ऋत्विक-चिन्तन के व्यापक परिदृश्य को एक ही आवरण में समेटना आसान काम नहीं है। लेकिन सम्पादक ज़ाहिद खान और जयनारायण प्रसाद ने अपने संयुक्त सम्पादन में जो ग्रंथ तैयार किया है—'ऋत्विक घटक : नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सृजक'—वह निस्संदेह ऋत्विक-प्रेमियों के लिए एक मूल्यवान संकलन है। बल्कि कहा जा सकता है, यह एक प्रामाणिक भंडार के समान है। सबसे पहले यह कहना जरूरी है कि इस ग्रंथ की सबसे बड़ी ताक़त इसकी बहुआयामी प्रकृति है। ऋत्विक घटक को यहाँ केवल एक फ़िल्मकार के रूप में नहीं देखा गया है; बल्कि उन्हें समझने का प्रयास किया गया है—एक दार्शनिक, समाज-सचेत कलाकार और एक गहरे रूप से आहत, विभाजित समय के प्रतिनिधि व्यक्ति के रूप में। उनके सिनेमा में जो देश विभाजन के घाव, पीड़ा, टूटन और मानव अस्तित्व की जटिलताएँ प्रतिबिम्बित हुई हैं—यह पुस्तक उसी अन्तर्लोक को पाठक के सामने प्रकट करती है। यह ग्रंथ केवल सम्पादित पुस्तक नहीं, बल्कि एक समग्र बौद्धिक और भावनात्मक दस्तावेज़ है, जो ऋत्विक घटक के व्यक्तित्व, विचार और सिनेमा को अनेक परतों में खोलता है। सम्पादक ज़ाहिद खान और जयनारायण प्रसाद ने जिस व्यापकता और संवेदनशीलता के साथ इस ग्रंथ को तैयार किया है, वह इसे हिन्दी में ऋत्विक घटक पर उपलब्ध सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तकों में शामिल करता है।
पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता इसका बहुस्तरीय विन्यास है। 'ऋत्विक घटक होने के मायने' जैसे प्रारम्भिक लेख पाठक को सीधे उस केन्द्रीय प्रश्न के सामने खड़ा करते हैं—'आख़िर ऋत्विक घटक आज भी क्यों प्रासंगिक हैं ?' गौतम घोष का लेख घटक की सृजनात्मकता और मानवीय दृष्टि को गहराई से व्याख्यायित करता है, वहीं सम्पादक ज़ाहिद खान और जयनारायण प्रसाद उनके चिन्तन और कार्य को एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक संदर्भ में रखकर देखने की कोशिश करते हैं। पुस्तक का 'धरोहर' खंड विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जहाँ स्वयं ऋत्विक घटक के निबंध, वक्तव्य और लेख संकलित हैं। जैसे 'सिनेमा और मैं', 'सिनेमा में प्रयोग और मैं', 'एकमात्र सत्यजित राय', 'बिजन भट्टाचार्य : जीवन के सूत्रधार' आदि। इन लेखों में घटक का विचारक रूप सामने आता है। एक ऐसा फिल्मकार जो केवल सिनेमा नहीं बनाता, बल्कि सिनेमा के माध्यम से समाज, इतिहास और मनुष्य की त्रासदी को समझने का प्रयास करता है। यहाँ उनका 'इप्टा' और जन नाट्य आंदोलन से जुड़ाव भी गहराई से उभरता है। 'दृष्टिकोण' खंड पुस्तक को और अधिक जीवंत बनाता है। सुरमा घटक, महाश्वेता देवी, सत्यजित राय, मृणाल सेन, सलिल चौधरी, उत्पल दत्त जैसी समकालीन और निकटजनों की स्मृतियाँ ऋत्विक घटक को एक इंसान के रूप में सामने लाती हैं—एक ऐसे कलाकार के रूप में जो भीतर से 'जलती हुई रूह...' था, 'अपनी शर्तों पर जीता था', और जिसके भीतर 'मिट्टी की गंध बसी थी...' इसी क्रम में गुलज़ार, मणि कौल, कुमार शाहनी, अडूर गोपालकृष्णन जैसे फ़िल्मकारों की टिप्पणियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि ऋत्विक घटक केवल अपने समय के नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भी फ़िल्मकार हैं। सफ़दर हाशमी का यह कथन कि “ऋत्विक घटक से पहले भारतीय सिनेमा की अपनी कोई भाषा नहीं थी”—उनके ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित करता है।
'साक्षात्कार' खंड में संकलित संवाद इस पुस्तक की आत्मा हैं। “मनुष्य का सांस्कृतिक मन नष्ट हो गया है” जैसे वक्तव्यों में घटक की गहरी सांस्कृतिक चिंता झलकती है। यहाँ वे केवल एक निर्देशक नहीं, बल्कि दार्शनिक और समाज-चिन्तक के रूप में उभरते हैं। 'मूल्यांकन' खंड पुस्तक को आलोचनात्मक गहराई प्रदान करता है। मंगलेश डबराल का निबंध 'कविता का सिनेमा', अरुण खोपकर, रविभूषण, अमिताभ श्रीवास्तव, पलाश विश्वास, विनोद दास, अरविंद दास आदि के लेख ऋत्विक घटक के सिनेमा को विभिन्न दृष्टियों से परखते हैं—चाहे वह विभाजन की त्रासदी हो, विस्थापन का दर्द, या उनकी मौलिक अभिव्यक्ति। इस पुस्तक की एक और बड़ी उपलब्धि यह है कि यह केवल ऋत्विक घटक के सिनेमा का उत्सव नहीं मनाती, बल्कि उसके भीतर छिपी बेचैनी, विफलताएँ और संघर्ष भी उजागर करती है। 'आमि बाँचते चाई !' जैसे सार्वभौमिक करुण स्वर को केन्द्र में रखकर यह पुस्तक हमें उस कलाकार से मिलवाती है, जो अपने समय से आगे था, और शायद इसी कारण अपने समय में पूरी तरह समझा नहीं गया। अंततः, यह कहा जा सकता है कि यह पुस्तक ऋत्विक घटक को 'पढ़ने', 'समझने' और 'महसूस' करने का दुर्लभ अवसर प्रदान करती है। हिन्दी पाठकों के लिए यह एक सेतु का काम करती है, जो उन्हें बंगाल के इस महान फ़िल्मकार के जटिल और गहन संसार से जोड़ती है। भाषा और प्रस्तुति के दृष्टिकोण से भी यह ग्रंथ सहजपाठ्य और गहन है। कहीं अधिक जटिल सैद्धांतिकता नहीं है, और न ही कहीं सतहीपन है। परिणामस्वरूप, नए पाठक ऋत्विक घटक को आसानी से पहचान सकते हैं, वहीं शोधकर्ता या फ़िल्मप्रेमी भी नई सोच और दृष्टिकोण से प्रेरणा प्राप्त कर सकते हैं। सम्पूर्ण रूप से, 'ऋत्विक घटक : नव यथार्थवादी सिनेमा का कलात्मक सृजक' केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक अनुभव है—ऋत्विक घटक की कला-जगत में प्रवेश का एक बहुआयामी द्वार। उनके सिनेमा, उनके जीवन, उनके दर्द और उनके क्रान्तिकारी विचार—सब कुछ अनुभव करने के लिए यह ग्रंथ एक अनिवार्य पाठ्य है।
सम्पर्क : मोबाइल नम्बर : 7004463348/9608352878
ईमेल एड्रेस : [email protected]


