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सागर यूनिवर्सिटी में पाँच दिन में दो जानलेवा हमले: एबीवीपी-आरएसएस पर हिंसा के आरोप

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सागर (मप्र) : मध्यप्रदेश के सागर स्थित डॉ. हरि सिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय में बीते पाँच दिनों के भीतर हुई दो हिंसक घटनाओं ने परिसर के शैक्षणिक और लोकतांत्रिक माहौल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (एआईएसएफ़) ने आरोप लगाया है कि उनके कार्यकर्ताओं और छात्रों पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े लोगों द्वारा सुनियोजित हमले किए गए। संगठन का कहना है कि यह घटनाएँ केवल छात्र राजनीति का टकराव नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों में वैचारिक असहिष्णुता और संगठित हिंसा की खतरनाक प्रवृत्ति का संकेत हैं।

एआईएसएफ़ के अनुसार 20 फरवरी को विश्वविद्यालय परिसर स्थित गौर स्तंभ के पास यूनिट सम्मेलन और स्टडी सर्किल का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम की पूर्व सूचना विश्वविद्यालय प्रशासन और स्थानीय पुलिस को दी गई थी। संगठन का दावा है कि कार्यक्रम के दौरान लगभग 100 से 150 लोगों की भीड़ अचानक वहां पहुंची और छात्रों के साथ मारपीट शुरू कर दी। इस हमले में कई छात्र घायल हुए। आरोप है कि घटना के समय पुलिस मौजूद थी, लेकिन प्रभावी हस्तक्षेप नहीं किया गया, जिससे हमलावरों के हौसले बुलंद हुए।

आरएसएस- एबीवीपी के कार्यकर्ताओं पर हमला का आरोप!

संगठन का कहना है कि मामला यहीं नहीं रुका, 23 फरवरी को 20 फरवरी की घटना के पीड़ित छात्र अपनी सुरक्षा की मांग को लेकर प्रॉक्टर कार्यालय पहुंचे थे। इसी दौरान प्रॉक्टर ऑफिस के सामने ही दोबारा हमला हुआ। छात्रों के चेहरे और आंखों पर प्रहार किए गए तथा लाठियों से पीठ पर वार किए गए। एआईएसएफ़ का आरोप है कि यह हमला स्पष्ट रूप से डर का माहौल बनाने और वैचारिक गतिविधियों को दबाने की कोशिश थी। पाँच दिनों में दो बार हुई हिंसा ने छात्रों के बीच भय और असुरक्षा की भावना को गहरा कर दिया है।

एआईएसएफ़ का कहना है कि उनके स्टडी सर्किल में वैज्ञानिक सोच, तार्किकता और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा की जाती है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में अध्ययन और विमर्श की स्वतंत्रता भी अब हिंसा के साये में संचालित होगी? संगठन के पदाधिकारियों का कहना है कि यदि छात्रों को विचार-विमर्श के लिए भी मारा जाएगा, तो यह उच्च शिक्षा संस्थानों के लोकतांत्रिक स्वरूप पर सीधा हमला है।

संगठन ने विश्वविद्यालय और पुलिस प्रशासन की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि पूर्व सूचना दिए जाने के बावजूद सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं किए गए। दो-दो हमलों के बाद भी किसी दोषी की गिरफ्तारी या कठोर कार्रवाई की जानकारी सामने नहीं आई है। एआईएसएफ़ ने दोनों घटनाओं की निष्पक्ष जांच, हमलावरों की तत्काल गिरफ्तारी, विश्वविद्यालय से निष्कासन और परिसर में लोकतांत्रिक गतिविधियों की सुरक्षा की गारंटी की मांग की है।

इसी बीच एआईएसएफ़ के पदाधिकारी बिट्टू कुमार ने सिविल लाइन थाना, सागर के थाना प्रभारी को एक लिखित आवेदन भी सौंपा है। आवेदन में कहा गया है कि 20 फरवरी की घटना के बाद भी विरोधी तत्व सोशल मीडिया और विश्वविद्यालय परिसर में झूठी अफवाहें फैला रहे हैं। संगठन पर शिवाजी महाराज के पोस्टर फाड़ने और देशविरोधी नारे लगाने जैसे आरोप लगाए जा रहे हैं, जिन्हें उन्होंने पूरी तरह निराधार और भड़काऊ बताया है। आवेदन में आशंका जताई गई है कि इस तरह के दुष्प्रचार से पुनः जानलेवा हमला हो सकता है। उन्होंने संगठन के पदाधिकारियों और सक्रिय सदस्यों को सुरक्षा प्रदान करने तथा झूठे प्रचार की जांच कराने की मांग की है।

ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन के कौंसिल मेम्बर विशाल ने कहा कि हिंसक घटनाओं के बाद काफी मशक्कत के बाद पुलिस ने मामला दर्ज किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि यदि संगठन लगातार प्रशासन पर दबाव नहीं बनाता, तो एफआईआर तक दर्ज नहीं होती। उनके मुताबिक हमले में घायल छात्रों के मन में अब भी डर का माहौल है, इसलिए उनकी पहली मांग है कि सभी पीड़ित छात्रों को तत्काल सुरक्षा प्रदान की जाए, ताकि वे बिना भय के अपनी पढ़ाई और शैक्षणिक गतिविधियाँ जारी रख सकें।

विशाल ने कहा कि एआईएसएफ़ संविधान के दायरे में रहकर अपनी बात रखता है और स्टडी सर्किल जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से वैचारिक विमर्श करता है। “हमें रोकने का काम किया जा रहा है। हमारी वैचारिक गतिविधियों को हिंसा और दुष्प्रचार के जरिए दबाने की कोशिश हो रही है,” उन्होंने आरोप लगाया। उन्होंने प्रशासन से मांग की कि आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए, ताकि विश्वविद्यालय परिसर में लोकतांत्रिक माहौल और छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

विश्वविद्यालय परिसर में लगातार बढ़ते तनाव ने छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों को भी चिंतित कर दिया है। एक केंद्रीय विश्वविद्यालय, जिसे विचार और विमर्श का खुला मंच होना चाहिए, वहां यदि छात्र संगठनों के बीच टकराव हिंसा का रूप ले ले, तो यह शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर संकेत है।

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