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युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं!

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डॉ. गिरीश

साम्राज्यवादी, युद्धोन्मादी अमेरिका और ज़ायोनी (Zionist) हिंसक इज़रायल द्वारा ईरान पर थोपे गए अवांछित और विध्वंसकारी युद्ध की विभीषिका पर कालजयी शायर साहिर लुधियानवी की मशहूर नज़्म आज और भी प्रासंगिक हो गई है। युद्ध के बारे में लिखी गई इस नज़्म का यद्यपि एक-एक हर्फ़ सार्थक और सोद्देश्य है, लेकिन ये चार पंक्तियाँ ही युद्ध की समूची फिलॉसफी को तार-तार कर देती हैं:

जंग तो ख़ुद ही एक मसअला है,

जंग क्या मसअलों का हल देगी।

आग और ख़ून आज बख्शेगी,

भूख और एहतियाज कल देगी।

अमेरिका और इज़रायल, ईरान पर थोपे गए इस युद्ध को उचित ठहराने के जो कारण गिनाते रहे हैं, वे तर्क की कसौटी पर कहीं भी खरे नहीं उतरते। वे कहते रहे हैं कि ईरान परमाणु बम बनाने जा रहा है। तो फिर सवाल उठता है कि आप कौन होते हैं उसे रोकने वाले? आप दोनों तो ख़ुद ही परमाणु हथियारों का भारी जखीरा लिए बैठे हैं। इज़रायल, ईरान का दसवां भाग भी नहीं है, लेकिन उसके गोदामों में भारी मात्रा में परमाणु अस्त्र-शस्त्र भरे पड़े हैं। वे प्रचारित करते हैं कि ईरानी परमाणु बम इज़रायल और अमेरिका को बर्बाद करने के लिए लक्षित हैं, तो फिर आप भी जवाब दीजिए कि क्या आपके हथियार शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए हैं? क्या हथियारों के बल पर दुनिया में कहीं कोई शांति स्थापित हुई है? दुनिया के किसी भी कोने में या इतिहास में कोई एक भी उदाहरण मिलता हो, तो ज़रूर बताइए।

फिर, गत वर्ष भी आपने परमाणु हथियारों को विनष्ट करने का बहाना लेकर ईरान के संभावित परमाणु केन्द्रों पर B-2 जैसे घातक बमवर्षकों से हमला बोल दिया था और दावा किया था कि नाभिकीय ठिकानों, नाभिकीय ईंधन और हथियारों को नष्ट कर दिया गया है। तो जवाब दीजिए कि आप दुनिया से तब झूठ बोल रहे थे या अब? क्या इससे साबित नहीं होता कि आप अपनी सनक, अपनी हनक और अपनी अर्थव्यवस्था—जो कच्चे-पक्के तेल और विनाशक हथियारों की तिजारत से फल-फूल रही है—की वासना के वशीभूत होकर ही दुनिया के कोने-कोने में युद्ध थोपते हैं और वहां लूटपाट कर निकल लेते हैं?

आपका दूसरा तर्क भी टिकाऊ नहीं है। दुनिया में लोकतंत्र के स्वयंभू रक्षक बनने की हसरत पाले बैठे आपने दावा किया था कि आप ईरान की इस्लामिक तानाशाही को समाप्त कर वहां लोकतंत्र स्थापित करना चाहते हैं। आपने अपने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए पहले सत्ता-विरोधी आंदोलन भड़काया, जिसमें आपको असफलता हाथ लगी। फिर आपने शांति वार्ता का नाटक रचा और वार्ता के दरमियान ही छलपूर्वक हमला कर सुप्रीमो अयातुल्लाह खोमैनी को उनके 44 साथियों सहित मार डाला। आपको लगा कि ईरान नेतृत्वविहीन हो गया और अब लोग सड़कों पर उतर आएंगे; तब आप ईरान में अपनी कठपुतली सरकार बैठा देंगे। आपने ईरान को वेनेज़ुएला समझने की भूल की और आपका यह सपना भी धरा का धरा रह गया।

आर्थिक-साम्राज्यवादी शोषण से संचित अपार धन-संपदा आपके पास है, और दुनिया के सोने का बड़ा हिस्सा आपके गोदामों में भरा है। कहावत है कि 'सर्वे गुणा: कांचनम् आश्रयन्ति' (अर्थात सारे गुण धन-संपदा में निहित हैं)। उसके बल पर आपने विध्वंसकारी हथियार जुटाए हैं और पिट्ठू इज़रायल के साथ मिलकर आपने ईरान के कोने-कोने को ध्वस्त कर दिया। आप निरंतर जीत के ख्याली दावे कर रहे हैं, फिर यह विनाशक जंग क्यों जारी है, इसका जवाब आप नहीं दे पा रहे हैं। साफ है, आपके पास हमले के लिए कोई वाजिब कारण था ही नहीं और अब जब इस महायुद्ध में आप गर्दन तक फंस गए हैं, तो उससे बाहर निकलने और नाक बचाने का आपको कोई रास्ता नहीं सूझ रहा है। जो दुर्गति आपने अफ़ग़ानिस्तान में झेली, वही आप ईरान में झेलने जा रहे हैं। अब तो आप समझ ही गए होंगे कि हज़ारों साल पुरानी सभ्यताएं चंद बमों से नष्ट नहीं की जा सकतीं।

आप और आपका देश मानवाधिकारों का पैरोकार बनने की कोशिशें करता रहा है। लेकिन इज़रायल द्वारा गाजा में किए जा रहे नरसंहार को आपका निर्लज्ज समर्थन हासिल है। इस बीच आपको शांतिदूत बनकर नोबेल शांति पुरस्कार पाने की सनक सवार है। एक उधार का नोबेल आप अपने गले में लटकाए घूम रहे हैं। आपके भारतीय मित्र भी इज़रायल जाकर एक ऐसा ही फर्जी तमगा गले में डलवा कर आत्म-संतुष्ट हैं। लेकिन 28 फरवरी को आपने एक बालिका विद्यालय पर थोड़े अंतराल से दो बार बमबारी कराई, जिसमें 168 निर्दोष बच्चियां और 14 अध्यापिकाएं शहीद हो गईं। आपको इस जघन्य अपराध के लिए क्षमा मांगनी चाहिए थी, लेकिन ढिठाई की सारी हदें पार करते हुए, आपने ईरान पर ही इसका आरोप जड़ दिया।

धनबल और शस्त्रबल में ईरान आपके सामने कहीं नहीं ठहरता, लेकिन जिस बहादुरी से वह इज़रायल और अमेरिकी अड्डों को तबाह कर रहा है, वह इतिहास के स्वर्णिम दस्तावेज़ों में दर्ज हो रहा है। इससे न केवल आपकी बौखलाहट बढ़ी है, अपितु हताशा में आपने एक बार फिर ईरानी नेतृत्व का संहार शुरू कर दिया है। सामंतवादी युग में भी युद्ध के कुछ नियम थे, लेकिन आधुनिकता और लोकतंत्र का परचम लहराने का नाटक करते हुए आपने सारे संसार पर जंगल के कानून थोप दिए।

आपके बक़ौल, आपने यह युद्ध अपने द्वारा गढ़े गए मुद्दों के हल के लिए शुरू किया था, लेकिन इसने आज अनेक नए मुद्दे खड़े कर दिए हैं। किसी भी देश के भीतर सत्ता में बदलाव उस देश का निजी मामला होता है। उस देश की जनता का अधिकार है कि वह लोकतांत्रिक तरीके से अपनी सरकार चुने। पर आपने तो सारी दुनिया में दखलंदाज़ी का ठेका ले रखा है। आपकी साज़िशों में सहभागी इज़रायल; फिलिस्तीन, गाजा, लेबनान और ईरान में वही सब कर रहा है। आपने वेनेज़ुएला में कमांडो ऑपरेशन चलाकर प्रेसीडेंट मादुरो और उनकी पत्नी का अपहरण कर उन पर अभियोग चलाया है। लेकिन एक संप्रभु देश की सीमाओं का अतिक्रमण कर वहां के राष्ट्राध्यक्ष के अपहरण का मुकदमा तो आप पर चलना चाहिए।

इराक, लीबिया और अब ईरान के नेतृत्व को आपने जिस तरह बलात हलाक किया है, क्या इससे युद्ध और हिंसा की नई परंपरा कायम नहीं हो गई? यदि यही परंपरा दूसरे शक्तिशाली देश भी शुरू कर दें, तो बची-खुची विश्व व्यवस्था भी तहस-नहस हो जाएगी। आपकी मनमानी से संयुक्त राष्ट्र संघ और अंतरराष्ट्रीय न्याय प्रणाली अंतिम सांसें गिन रहे हैं और बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया है कि अमेरिका-इज़रायल को कौन युद्ध अपराधी घोषित करेगा? कौन उन्हें दंडित करेगा? आप सारी दुनिया को ईरान के खिलाफ बरगला कर विश्वयुद्ध भड़काना चाहते हैं। आप उन देशों का आह्वान कर रहे हैं कि वे अपनी सेनाएं होर्मुज़ (Hormuz) भेजें, जिनके जहाज़ वहां फंसे हैं।

आपके इस मनमाने कदम से विश्व अर्थव्यवस्था आज चरमरा कर रह गई है। शिपिंग का खर्च 5 गुना बढ़ गया है। अकेले भारत का ही 12,000 करोड़ का माल समुद्र में फंसा है। कच्चे तेल की कीमतें काबू के बाहर जा चुकी हैं। रसोई गैस की महंगाई और अनुपलब्धता ने घर और बाज़ार की व्यवस्था पर गहरी चोट की है। शेयर बाज़ार धड़ाम हो गए हैं। डॉलर के मुक़ाबले रुपया 92 के ऊपर हो गया है। आयात-निर्यात में भारी गिरावट है। पेट्रोलियम पदार्थ आधारित उद्योग ठप पड़ चुके हैं। इसका प्रभाव अन्य उद्योगों पर साफ दिख रहा है। बेरोज़गारी में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। प्राकृतिक और मानव-निर्मित संपदाओं की बड़े पैमाने पर बर्बादी हो रही है। पर्यावरण को अकल्पनीय क्षति पहुंची है। आप इन समूचे हालातों पर संवेदनशील और तार्किक रुख अपनाने के बजाय निरंतर उकसावे और विनाशकारी कारगुज़ारियों में जुटे हैं।

जंग खत्म करने के अंतर्राष्ट्रीय प्रयासों की अनुपस्थिति में ईरान ने ही आगे बढ़कर जंग खत्म करने की सशर्त पेशकश की है। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान ने साफ कहा है कि अगर क्षेत्र में जारी तनाव और जंग को खत्म करना है, तो पहले ईरान के अधिकारों को स्वीकार करना होगा। उन्होंने कहा कि हालिया हमलों से हुए नुकसान की भरपाई की जाए और भविष्य में ईरान पर किसी तरह के हमले न हों, इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गारंटी दी जाए। तेहरान ने स्पष्ट किया है कि इन शर्तों के बिना स्थाई शांति संभव नहीं है।

विश्व जनमत को ईरान की इस पुकार को सुनना चाहिए ताकि जंग जल्द से जल्द खत्म हो और पृथ्वी एवं मानवता का भविष्य सुरक्षित हो सके। युद्ध किसी समस्या का समाधान न कभी हुआ है, न होगा। साहिर की पंक्तियाँ याद आती हैं:

इसलिए ऐ शरीफ़ इंसानों,

जंग टलती रहे तो बेहतर है।

आप और हम सभी के आँगन में,

शमा जलती रहे तो बेहतर है।

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